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15 लाख रुपए की लागत से गोबरी नदी पर बना रपटा पुल चढ़ा भ्रष्टाचार की भेंट, पुल तो बन गया, लेकिन उसके दोनों ओर पहुंचने का रास्ता यानी एप्रोच रोड है गायब

Priyanshu Ranjan

सूरजपुर । सरकारी निर्माण कार्यों का उद्देश्य आम जनता को सुविधा देना होता है, लेकिन यदि करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता की परेशानी पहले जैसी बनी रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर निर्माण हुआ किसके लिए?

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गोबरी नदी पर बना रपटा पुल आज कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर रहा है। आठ महीने पहले पुराना पुल टूट गया, ग्रामीणों ने राहत की उम्मीद की। शासन ने लगभग 15 लाख रुपये स्वीकृत किए। विभाग ने जल्दबाजी में रपटा भी बना दिया, फोटो भी खिंच गए, फाइलें भी आगे बढ़ गईं, शायद भुगतान की प्रक्रिया भी पूरी हो गई होगी, लेकिन आज भी यदि कोई किसान, स्कूली बच्चा, मरीज या आम राहगीर उस रास्ते से गुजरना चाहे तो उसे समझ में आ जाएगा कि सरकारी कागजों में पुल बन चुका है, मगर जमीन पर रास्ता अभी भी अधूरा है ।

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सबसे दिलचस्प बात यह है कि पुल तो बन गया, लेकिन उसके दोनों ओर पहुंचने का रास्ता यानी एप्रोच रोड ही नहीं बनाई गई। पहली हल्की बारिश ने ही पूरे निर्माण की पोल खोल दी। पुल के दोनों ओर दलदल है, कीचड़ है, फिसलन है और दुर्घटनाओं का खतरा है।

अब जनता पूछ रही है—

क्या विभाग को लगा कि लोग हेलीकॉप्टर से सीधे पुल पर उतरेंगे?

व्यंग्य यही है…पुल तैयार, रास्ता तैयार नहीं… शायद जनता उड़कर आएगी!

सरकारी इंजीनियरिंग का यह नया मॉडल शायद पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल होना चाहिए, पहले पुल बनाइए, फिर वर्षों तक सोचिए कि उस तक पहुंचा कैसे जाए,

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यदि कोई नागरिक पूछे कि एप्रोच रोड कहां है, तो उसे दूसरे विभाग का पता बता दीजिए, लगता है गोबरी नदी पर विकास नहीं, बल्कि ‘विभागीय जिम्मेदारी पासिंग प्रतियोगिता’ आयोजित की गई है।

15 लाख का बजट…लेकिन ग्रामीणों को दिख रहा 5-7 लाख का काम-

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि लगभग 15 लाख रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन मौके पर जो निर्माण दिखाई देता है, वह कहीं कम लागत का प्रतीत होता है। यदि यह आरोप गलत है तो विभाग तकनीकी विवरण सार्वजनिक करे। यदि सही है, तो फिर यह केवल घटिया निर्माण नहीं बल्कि वित्तीय अनियमितता की जांच का विषय भी बन सकता है।

पंचनामा बोला—29 पाइप पुराने हैं

ग्रामीणों की शिकायत के बाद जब प्रशासनिक जांच हुई तो पंचनामे में उल्लेख किया गया कि कुल 30 ह्यूम पाइपों में से 29 पुराने हैं और केवल एक नया है। यदि जांच रिपोर्ट यही कहती है तो फिर कई सवाल पैदा होते हैं। पुराने पाइप क्यों लगाए गए? क्या इसकी अनुमति थी? क्या एस्टीमेट में पुराने पाइप का उल्लेख था? यदि नहीं, तो भुगतान किस आधार पर हुआ?

एस्टीमेट और ड्रॉइंग भी मौके पर नहीं!

बताया गया कि जांच के दौरान संबंधित अधिकारी मौके पर एस्टीमेट और अधिकृत ड्रॉइंग तक प्रस्तुत नहीं कर सके। तकनीकी निर्माण में यही सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। यदि मौके पर यही उपलब्ध नहीं थे तो गुणवत्ता का परीक्षण किस आधार पर होगा?

पहली बारिश में खुल गई सारी इंजीनियरिंग

कहते हैं किसी निर्माण की असली परीक्षा पहली बारिश लेती है। गोबरी नदी का रपटा इस परीक्षा में बुरी तरह फेल दिखाई दिया। हल्की बारिश हुई और दोनों ओर कीचड़ भर गया।बाइक फंसने लगी, पैदल चलना मुश्किल हो गया, स्कूली बच्चे गिरने लगे, किसान परेशान हो गए, मरीजों को दूसरे रास्ते तलाशने पड़े।

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अब सवाल है—

यदि इतनी सी बारिश में यह हाल है, तो भारी बारिश में क्या होगा?

स्कूली बच्चे, किसान और मरीज सबसे ज्यादा परेशान-

यह केवल सड़क का मामला नहीं है, यह शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़ा मुद्दा है। बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कत हो रही है, किसानों का खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है, बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना जोखिम भरा हो गया है।सरकारी योजनाओं का उद्देश्य सुविधा देना होता है, लेकिन यहां निर्माण स्वयं परेशानी बन गया है।

सीएम हेल्पलाइन में लगातार शिकायतें

क्षेत्र के युवाओं ने अब इस मामले को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक पहुंचा दिया है। लगातार शिकायतें दर्ज हो रही हैं, युवाओं का कहना है कि स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही। इसलिए अब उच्च स्तर से कार्रवाई की उम्मीद है।

क्या केवल रपटा बनाकर विभाग जिम्मेदारी से मुक्त हो गया?

यदि एप्रोच रोड नहीं बनी, यदि आवागमन शुरू नहीं हुआ, यदि जनता अब भी फंस रही है तो क्या विभाग यह कह सकता है कि उसका काम पूरा हो गया? सरकारी निर्माण केवल बिल पास कराने के लिए नहीं होते, उनका उद्देश्य जनता को सुविधा देना होता है।

सेतु विभाग बोला…पीडब्ल्यूडी बनाएगा… पीडब्ल्यूडी बोला…सेतु विभाग बनाएगा…

जब इस गंभीर समस्या पर दोनों विभागों से बात की गई तो जवाब किसी कॉमेडी फिल्म के संवाद से कम नहीं थे। सेतु विभाग का कहना है कि एप्रोच रोड पीडब्ल्यूडी बनाएगा, पीडब्ल्यूडी का कहना है कि पूरा प्रोजेक्ट सेतु विभाग का है। यानी जनता बीच में खड़ी है और दोनों विभाग जिम्मेदारी को फुटबॉल की तरह एक-दूसरे के पाले में उछाल रहे हैं।

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सवाल यह है कि जब दोनों विभागों को पता ही नहीं कि एप्रोच रोड कौन बनाएगा, तब 15 लाख रुपये का निर्माण प्रस्ताव किसने तैयार किया? तकनीकी स्वीकृति किसने दी? कार्य पूर्ण किसने माना?

जनता पूछ रही है…

क्या बिना एप्रोच रोड के कोई पुल उपयोगी माना जा सकता है?

15 लाख रुपये आखिर कहां खर्च हुए?

29 पुराने पाइप लगाने की अनुमति किसने दी?

तकनीकी जांच कब होगी?

दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या नहीं?

दोनों विभागों में वास्तविक जिम्मेदार कौन है?

क्या यह मामला भी कुछ दिनों बाद फाइलों में दफन हो जाएगा?

व्यंग्य का आखिरी सवाल…-

यदि पुल तक पहुंचने का रास्ता नहीं है…यदि दोनों विभाग जिम्मेदारी नहीं ले रहे…यदि बारिश में जनता फंस रही है…यदि जांच के बाद भी सुधार नहीं हो रहा…तो क्या अगली बार शासन ‘रपटा देखने के लिए नाव’ भी स्वीकृत करेगा? क्योंकि वर्तमान स्थिति में पुल से ज्यादा मजबूत केवल विभागों की बहानेबाजी दिखाई दे रही है।

अब आवश्यकता केवल जांच समिति बनाने की नहीं, बल्कि तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की है। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसी से जवाब नहीं मांगा जाएगा, तब तक ऐसे अधूरे निर्माण जनता के लिए राहत नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही के स्मारक बनते रहेंगे।

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