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सेवा सहकारी समिति केरजू के प्रबंधक दिनेश गुप्ता की आत्महत्या के सात माह बाद सीतापुर पुलिस ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक भूपेंद्र सिंह परिहार के खिलाफ किया अपराध दर्ज,

Priyanshu Ranjan

अंबिकापुर । सेवा सहकारी समिति केरजू के प्रबंधक दिनेश गुप्ता की आत्महत्या के लगभग सात माह बाद सीतापुर पुलिस ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक भूपेंद्र सिंह परिहार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108 एवं 3(5) के तहत अपराध दर्ज किया है। एफआईआर मृतक की पत्नी, परिजनों, अन्य गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मर्ग जांच के दौरान एकत्र साक्ष्यों के आधार पर दर्ज की गई है।

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मामले ने सहकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली, कर्मचारियों पर बनाए जाने वाले प्रशासनिक दबाव और वित्तीय अनियमितताओं से निपटने के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि पुलिस जांच में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं बल्कि पूरे तंत्र की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न माना जाएगा। वहीं आरोपित पक्ष का पक्ष न्यायिक प्रक्रिया में सामने आना अभी बाकी है।

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52 लाख के कथित गबन का मामला बना तनाव की वजह

पुलिस के अनुसार मूलजिमापारा निवासी 55 वर्षीय दिनेश गुप्ता ग्राम केरजू सेवा सहकारी समिति में प्रबंधक थे। उन पर करीब 52 लाख रुपये के कथित गबन का आरोप लगाया गया था। आरोप है कि तत्कालीन शाखा प्रबंधक लगातार राशि जमा करने का दबाव बना रहे थे तथा ऐसा नहीं करने पर नौकरी से हटाने, विभागीय कार्रवाई और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही थी। मृतक की पत्नी सुनीता गुप्ता ने अपने बयान में कहा कि इसी लगातार मानसिक दबाव के कारण उनके पति अवसाद में चले गए थे और अंततः 25-26 दिसंबर 2025 की रात उन्होंने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

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दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि 52 लाख रुपये के कथित गबन के मूल मामले की निष्पक्ष जांच भी पूरी हो। यदि वास्तव में वित्तीय अनियमितता हुई थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी, राशि का नुकसान कैसे हुआ और उसकी वसूली या जांच किस स्थिति में है—इन बिंदुओं पर भी अब तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

अब जांच की दिशा पर रहेगी नजर

एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस विवेचना आगे बढ़ा रही है। जांच में यह स्पष्ट होगा कि क्या वास्तव में आरोपी अधिकारी के व्यवहार और कथित मानसिक दबाव का सीधा संबंध आत्महत्या से था या नहीं। न्यायालय में प्रस्तुत होने वाले साक्ष्य ही अंततः इस मामले की दिशा तय करेंगे। यह मामला केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं बल्कि सरकारी और सहकारी संस्थाओं में कार्यरत कर्मचारियों के साथ व्यवहार, जवाबदेही और प्रशासनिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा माना जा रहा है।

यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं तो यह संदेश जाएगा कि प्रशासनिक अधिकार का दुरुपयोग किसी कर्मचारी के जीवन से बड़ा नहीं हो सकता। वहीं यदि आरोप सिद्ध नहीं होते तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पूरे घटनाक्रम की वास्तविक जिम्मेदारी आखिर किस पर थी।

सात माह तक क्यों चलता रहा इंतजार?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि घटना दिसंबर 2025 में हुई, लेकिन एफआईआर जुलाई 2026 में दर्ज हुई। पुलिस का कहना है कि मर्ग जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों के परीक्षण के बाद अपराध दर्ज किया गया। हालांकि कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन इतने लंबे अंतराल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि शुरुआती जांच में मानसिक प्रताड़ना के संकेत मिल रहे थे तो कार्रवाई में सात महीने का समय क्यों लगा? क्या जांच में देरी ने साक्ष्यों और गवाहों को प्रभावित किया? इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।

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गबन की जांच और मानसिक प्रताड़ना—दो अलग पहलू

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी कर्मचारी पर वित्तीय अनियमितता का संदेह हो तो विभागीय जांच और कानूनी कार्रवाई नियमानुसार की जानी चाहिए। लेकिन जांच के दौरान किसी कर्मचारी पर ऐसा मानसिक दबाव नहीं बनाया जा सकता जिससे उसका जीवन संकट में पड़ जाए।

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