धारा 248 के तहत कार्रवाई; राजस्व अभिलेखों में सड़क मद की भूमि पर कब्जा प्रमाणित, अनावेदक ने सीमांकन और पंचनामा प्रक्रिया पर उठाए सवाल, हाईकोर्ट जाने के संकेत,
सूरजपुर। सूरजपुर शहर में शासकीय सड़क की भूमि पर कथित अतिक्रमण कर ट्रिपल स्टोरी भवन, कार्यालय, फैक्ट्री और बाउंड्रीवाल बनाए जाने के मामले में तहसीलदार न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। लंबी सुनवाई, राजस्व अभिलेखों, पटवारी एवं राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट, दोनों पक्षों के तर्क तथा न्यायालयीन संदर्भों पर विचार करने के बाद तहसीलदार ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 के तहत संबंधित अनावेदक रितेश अग्रवाल (पिता- सुरेश अग्रवाल) को शासकीय भूमि से बेदखल करने का आदेश जारी किया है। न्यायालय ने तीन दिनों के भीतर स्वयं अतिक्रमण हटाकर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आदेश का पालन नहीं होने पर राजस्व विभाग नियमानुसार बेदखली की कार्रवाई करेगा।
शासकीय सड़क की भूमि पर निर्माण का आरोप
राजस्व अभिलेखों के अनुसार नगर सूरजपुर स्थित खसरा क्रमांक 2630 (कुल रकबा 1.975 हेक्टेयर) शासकीय सड़क मद में दर्ज है। पटवारी हल्का क्रमांक-08 की रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 0.033 हेक्टेयर भूमि पर ट्रिपल स्टोरी भवन, कार्यालय, फैक्ट्री और बाउंड्रीवाल का निर्माण कर कब्जा किया गया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार न्यायालय में प्रकरण दर्ज कर सुनवाई शुरू हुई।
आपत्तिकर्ता ने कहा- सार्वजनिक भूमि पर निजी कब्जा
प्रकरण में आपत्तिकर्ता कुंज बिहारी गुप्ता ने न्यायालय में कहा कि सड़क की सरकारी भूमि पर पक्का भवन बनाकर फैक्ट्री संचालित की जा रही है, जो सार्वजनिक हित के विपरीत है। उन्होंने अतिक्रमण हटाने की मांग करते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रिट क्रमांक 866/2026 (डी.के. सोनी एवं अन्य बनाम शासन) के आदेश का भी हवाला दिया।
बचाव पक्ष की दलीलें न्यायालय ने नहीं मानीं
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध राजस्व अभिलेख, पटवारी रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि संबंधित भूमि शासकीय सड़क मद में दर्ज है तथा उस पर निर्माण किया गया है। न्यायालय ने माना कि अनावेदक की आपत्तियां अतिक्रमण के निष्कर्ष को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर धारा 248 के तहत बेदखली का आदेश पारित किया गया।
अनावेदक ने सीमांकन प्रक्रिया पर उठाए सवाल
अनावेदक रितेश अग्रवाल ने न्यायालय में दावा किया कि पटवारी एवं राजस्व निरीक्षक द्वारा तैयार पंचनामा उनकी अनुपस्थिति में और पक्षपातपूर्ण तरीके से बनाया गया। उन्होंने कहा कि पुराने राजस्व नक्शों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया तथा सड़क की वास्तविक चौड़ाई और सीमाएं वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित नहीं की गईं। उनका कहना है कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से वहां व्यापार कर रहा है और किसी नए अतिक्रमण का प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने संयुक्त सीमांकन, स्थल निरीक्षण और आधुनिक सर्वे तकनीक से पुनः जांच कराने की मांग की।
तीन दिन बाद प्रशासनिक कार्रवाई की तैयारी
तहसीलदार न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि तीन दिनों के भीतर स्वयं अतिक्रमण नहीं हटाया गया तो राजस्व विभाग नियमानुसार बेदखली की कार्रवाई करेगा। आवश्यकता पड़ने पर पुलिस बल की मदद भी ली जा सकती है।
अब कई सवालों पर प्रशासन की परीक्षा
यह मामला अब केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि निर्माण वास्तव में सरकारी सड़क की भूमि पर हुआ था तो ट्रिपल स्टोरी भवन, कार्यालय और फैक्ट्री बनने तक संबंधित विभागों ने कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या निर्माण के दौरान नगर पालिका और राजस्व विभाग ने निरीक्षण किया था? वहीं यदि सीमांकन और पंचनामा प्रक्रिया पर लगाए गए आरोपों में दम है, तो क्या यह मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचेगा?
फिलहाल तहसीलदार न्यायालय का आदेश प्रभावी है और अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश का क्रियान्वयन किस प्रकार करता है।