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सूरजपुर के 76 वर्षीय बुजुर्ग ने अपनी तीन बेटियों पर लगाया धोखे से 85 डिसमिल जमीन हड़पने का आरोप,,,

Priyanshu Ranjan

सूरजपुर । पहले पिता का सहारा लिया जाता था, अब पिता की जमीन का। सुरजपुर जिले के मानपुर वार्ड क्रमांक 14 से सामने आया यह मामला केवल एक परिवार का विवाद नहीं, बल्कि रिश्तों के विघटन, सत्ता के प्रभाव और व्यवस्था की कमजोरी का संयुक्त दस्तावेज बनकर उभरा है।

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76 वर्षीय बुजुर्ग रामचरित साहू ने आरोप लगाया है कि उनकी ही बेटियों ने जिसमे संगीता साहू, सुनीता साहू, सविता साहू और सीता देवी शामिल है, ने स्थानीय पार्षद राजेश कुमार साहू और कथित भू-माफिया राधाकृष्ण साहू के साथ मिलकर उनकी करीब 85 डिसमिल कीमती जमीन को धोखे से अपने नाम करा लिया।

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रिश्तों का बदलता अर्थः ‘वारिस’ या ‘व्यवस्थापक’?

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे चुभने वाली बात यह है कि आरोप किसी बाहरी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि अपने ही परिवार पर है। जिस पिता ने जीवनभर परिवार को संजोया, वही आज आरोप लगा रहा है कि उसकी ही बेटियों ने योजनाबद्ध तरीके से उसकी संपत्ति को अपने नाम करा लिया। इकलौते बेटे की मृत्यु के बाद जो जमीन बची थी, वही परिवार जिसमे विशेषकर विधवा बहू और छोटे बच्चों के जीवन का आधार थी, लेकिन अब वही जमीन विवाद का केंद्र बन गई है। यहां विरासत का बंटवारा नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का अंत हुआ है।

‘पावर ऑफ अटॉर्नी’, अधिकार का कागज़ या कब्ज़े का औजार?

मामले की जड़ में है पावर ऑफ अटॉर्नी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्हें बहला- फुसलाकर, यहां तक कि कथित रूप से नशे की हालत में, अंबिकापुर ले जाया गया और वहां बिना स्पष्ट जानकारी दिए दस्तावेज तैयार करवा लिए गए।यह सवाल स्वाभाविक है, क्या यह सहमति थी या परिस्थिति का फायदा उठाकर बनाई गई ‘सहमति’? यहां हस्ताक्षर से पहले हालात तैयार किए गए, फिर कागज़ तैयार हुआ।

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गवाह भी अपने, खेल भी अपना

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एक बेटी ने पावर ऑफ अटॉर्नी अपने नाम से बनवाई और उसमें अपने पति और बेटे को गवाह बनाया। कानूनी भाषा में भले यह संभव हो, लेकिन नैतिक दृष्टि से यह सवाल उठता है क्या गवाह वास्तव में निष्पक्ष थे? जब गवाही भी घर की और फायदा भी घर का तो सच का प्रतिनिधि कौन?

पार्षद की भूमिका : जनसेवा या ‘जमीन सेवा’?

इस पूरे मामले में स्थानीय पार्षद राजेश कुमार साहू की भूमिका भी चर्चा में है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पार्षद ने इस पूरी प्रक्रिया में सहयोग किया और यहां तक कहा कि मेरा कोई कुछ नहीं कर सकता। मेरी पहुंच ऊपर तक है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्न है।

सबसे कमजोर की कहानी : बहू और पोते

इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा प्रभावित वे हैं, जिनकी आवाज सबसे कमजोर है विधवा बहू और छोटे बच्चे। जिस जमीन से उनका भविष्य जुड़ा था, वही अब विवाद और अनिश्चितता का कारण बन गई है। यहां जमीन नहीं गई, एक परिवार का सहारा गया है।

शिकायत के बाद दबाव और डर

शिकायत पत्र में उल्लेख है कि शिकायत करने के बाद पीडि़त को लगातार धमकियां दी जा रही हैं और शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। पहले जमीन छीनी गई, अब आवाज दबाने की कोशिश हो रही है।

सिस्टम पर सवालः सुविधा या कमजोरी?

यह मामला केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। रजिस्ट्री होते ही नामांतरण, दस्तावेजों की गहन जांच का अभाव, विवाद होने पर लंबी न्यायिक प्रक्रिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि जमीन हड़पना आसान और उसे वापस पाना कठिन, सिस्टम तेज है—लेकिन सच से ज्यादा कागज़ के लिए।

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मामला या चेतावनी?

यह घटनाक्रम केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि एक संकेत है कि पारिवारिक विश्वास टूट रहा है। व्यवस्था का दुरुपयोग संभव है और न्याय पाने की प्रक्रिया जटिल होती जा रही है।

कागज़, सत्ता और रिश्तों का टकराव

सूरजपुर का यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या अब रिश्तों से ज्यादा ताकतवर कागज़ हो गए हैं? क्या जनप्रतिनिधि सुविधा का माध्यम बनते जा रहे हैं? क्या सिस्टम की सरलता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है?

अंतिम व्यंग्य

यहां बेटी वारिस नहीं, ‘व्यवस्थापक’ बन गई, पार्षद जनसेवक नहीं, ‘प्रक्रिया सलाहकार’ बन गया और पिता—सिर्फ एक हस्ताक्षर बनकर रह गया! (रिपोर्ट जारी है)

अगली कड़ीः रजिस्ट्री सिस्टम की अंदरूनी सच्चाई और जिम्मेदार कौन?

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