बसदेई के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। कागजों में अस्पताल में डॉक्टरों की ड्यूटी तय है, नाइट रोस्टर भी बना हुआ है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। रात होते ही अस्पताल की व्यवस्था लगभग नर्सिंग स्टाफ के भरोसे चलने लगती है और मरीजों को इलाज से ज्यादा रेफर मिलने की उम्मीद रहती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में डॉक्टरों की नाइट ड्यूटी तो लगाई जाती है, लेकिन अधिकांश समय डॉक्टर अस्पताल में मौजूद नहीं रहते। ऐसे में इमरजेंसी में आने वाले मरीजों का प्राथमिक उपचार नर्सों के भरोसे होता है और गंभीर हालत होने पर उन्हें सूरजपुर जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया जाता है। सवाल यह उठ रहा है कि जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ही डॉक्टर उपलब्ध नहीं होंगे, तो ग्रामीण क्षेत्र के मरीज आखिर जाएं तो जाएं कहां?
ड्यूटी रोस्टर सिर्फ दीवार की शोभा?
बसदेई पीएचसी में डॉक्टरों के लिए बाकायदा ड्यूटी रोस्टर तैयार किया गया है। रोस्टर में किस डॉक्टर की कब ड्यूटी है, यह स्पष्ट रूप से दर्ज है, लेकिन स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि यह रोस्टर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है। ग्रामीणों के मुताबिक रोस्टर में नाम जरूर लिखा रहता है, लेकिन ड्यूटी के समय डॉक्टर नजर नहीं आते। अस्पताल की दीवारों पर चस्पा ड्यूटी चार्ट और अस्पताल की वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। आरोप है कि यह व्यवस्था केवल निरीक्षण और कागजी खानापूर्ति तक सीमित होकर रह गई है।
नियम क्या कहते हैं?
ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ डॉक्टरों के लिए मुख्यालय में निवास करना इसलिए अनिवार्य माना जाता है ताकि इमरजेंसी के समय तुरंत सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उद्देश्य ही ग्रामीण मरीजों को तत्काल और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा देना है, लेकिन बसदेई पीएचसी की स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि यदि डॉक्टर मुख्यालय में मौजूद ही नहीं रहेंगे, तो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
जिम्मेदार मौन क्यों?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पूरे मामले की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। लोगों का कहना है कि निरीक्षण के दौरान व्यवस्थाएं कागजों में दुरुस्त दिखाई जाती हैं, जबकि जमीनी सच्चाई अलग होती है।
रात में डॉक्टर नहीं, फोन पर चलती व्यवस्था
सूत्रों के अनुसार, नाइट ड्यूटी के दौरान कई बार डॉक्टर अस्पताल में उपस्थित नहीं रहते और स्थिति की जानकारी फोन पर ली जाती है। ऐसे में किसी गंभीर मरीज के आने पर नर्सिंग स्टाफ को ही स्थिति संभालनी पड़ती है। हालांकि नर्सिंग स्टाफ अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करता है, लेकिन बिना डॉक्टर के गंभीर मरीजों का उपचार करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। कई बार सही निर्णय लेने में देरी मरीज की हालत को और बिगाड़ सकती है।
इलाज कम, रेफर ज्यादा
बसदेई पीएचसी को लेकर ग्रामीणों में सबसे बड़ी नाराजगी यही है कि यहां इलाज से ज्यादा रेफर किया जाता है। हल्की गंभीर स्थिति वाले मरीजों को भी जिला अस्पताल सूरजपुर भेज दिया जाता है। इससे मरीजों और उनके परिजनों को अतिरिक्त आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती है। रात के समय स्थिति और ज्यादा चिंताजनक हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण तत्काल वाहन की व्यवस्था करना आसान नहीं होता। कई बार मरीज घंटों तक अस्पताल परिसर में इंतजार करते रहते हैं।
प्रभारी डॉक्टर पर भी उठे सवाल
बसदेई पीएचसी की प्रभारी डॉक्टर पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वे मुख्यालय में निवास नहीं करतीं और रोजाना अपने निजी निवास से आना-जाना करती हैं। सबसे बड़ा सवाल उस सरकारी क्वार्टर को लेकर है जो उनके लिए आवंटित किया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल परिसर में बना सरकारी आवास वर्षों से बंद पड़ा है और उस पर ताला लटका हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रभारी डॉक्टर मुख्यालय में ही निवास करें, तो आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तुरंत उपचार मिल सकता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में रात के समय मरीजों को तत्काल चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिल पा रही।
ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश
स्वास्थ्य सेवाओं की इस स्थिति को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। लोगों का कहना है कि अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी सुनिश्चित होनी चाहिए और नाइट ड्यूटी की वास्तविक मॉनिटरिंग की जानी चाहिए। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की यही स्थिति रही, तो सरकार की ग्रामीण स्वास्थ्य योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी।
बड़ा सवाल अब भी कायम
बसदेई पीएचसी की मौजूदा स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की उस तस्वीर को सामने ला रही है जहां कागजों में व्यवस्था दुरुस्त दिखती है, लेकिन जमीन पर मरीज अब भी भगवान भरोसे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि —
क्या ड्यूटी रोस्टर सिर्फ दिखावे के लिए बनाया जा रहा है?
आखिर नाइट ड्यूटी में डॉक्टर अस्पताल में मौजूद क्यों नहीं रहते?
सरकारी क्वार्टर खाली होने के बावजूद मुख्यालय में निवास क्यों नहीं किया जा रहा?
क्या स्वास्थ्य विभाग इस लापरवाही पर कार्रवाई करेगा?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?