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अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायधीश सूरजपुर ने हत्या के दो आरोपियों को सुनाई 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास के साथ 10-10 हजार रुपए अर्थदंड की सजा,

Priyanshu Ranjan

पुलिस के मजबूत विवेचना एवं सटीक दस्तावेजीकरण से पीड़ित पक्ष को दो साल के भीतर मिला न्याय,

सूरजपुर । कहा जाता है कि न्यायालय में न्याय की शुरुआत थाने की विवेचना से होती है।यदि पुलिस सही दिशा में निष्पक्ष और मजबूत जांच करे, साक्ष्यों को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करे और केस डायरी को तथ्यात्मक रूप से तैयार करे, तो अपराधियों को सजा तक पहुंचाना आसान हो जाता है।

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सूरजपुर जिले में ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया है, जहां पुलिस की मजबूत विवेचना और सटीक दस्तावेजीकरण के आधार पर न्यायालय ने हत्या के मामले में दो आरोपियों को 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।

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मामला वर्ष 2024 के मई माह का है, जब थाना सूरजपुर क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पर्री में एक युवक को पेड़ से बांधकर बेरहमी से मारपीट किए जाने का मामला सामने आया था। गंभीर रूप से घायल युवक की मौत के बाद पुलिस ने मामले को हत्या से संबंधित धाराओं में दर्ज कर विवेचना शुरू की थी।

प्रकरण की सुनवाई एडीजे (अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश) सूरजपुर श्री डी.के. गिलहरे की अदालत में हुई। न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयान और पुलिस विवेचना को महत्वपूर्ण मानते हुए दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304/34 के तहत दोषी करार दिया। न्यायालय ने आरोपी रामसाय सिंह एवं शिवचरण सिंह को 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास तथा 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। साथ ही आदेश में कहा गया है कि जुर्माना राशि जमा नहीं करने की स्थिति में दोनों आरोपियों को अतिरिक्त एक-एक वर्ष का सश्रम कारावास भुगतना होगा।

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सूरजपुर न्यायालय का यह फैसला केवल दो आरोपियों को सजा देने भर का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण भी है कि यदि पुलिस विवेचना मजबूत हो, साक्ष्य व्यवस्थित हों और अभियोजन प्रभावी हो, तो न्याय की राह आसान हो जाती है। यह निर्णय कानून व्यवस्था में जनता के विश्वास को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

पेड़ से बांधकर की गई थी मारपीट, मई 2024 में दर्ज हुआ था मामला-

अदालती दस्तावेजों के अनुसार यह मामला थाना सूरजपुर के अपराध क्रमांक 290/2024 से संबंधित है, घटना 26 मई 2024 की बताई गई है, जबकि एफआईआर 27 मई 2024 को दर्ज की गई थी। सूरजपुर कोतवाली पुलिस थाना प्रभारी विमलेश दुबे ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित कार्रवाई करते हुए साक्ष्य संकलित किए। गवाहों के बयान दर्ज किए और न्यायालय में मजबूत तरीके से अभियोजन प्रस्तुत किया। इसी का परिणाम रहा कि लगभग दो वर्ष के भीतर मामले में फैसला सुनाया गया।

मजबूत विवेचना से मजबूत न्याय, पुलिस की भूमिका रही अहम-

कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मामले में पुलिस विवेचना सबसे अहम कड़ी होती है। यदि शुरुआती स्तर पर लापरवाही हो जाए, तो कई बार गंभीर मामलों में भी आरोपी बच निकलते हैं। इस मामले में पुलिस द्वारा घटनास्थल से साक्ष्य संकलन, गवाहों के बयान और अभियोजन पक्ष के साथ समन्वय मजबूत रहा, जिसके कारण न्यायालय के समक्ष मामला प्रभावी ढंग से प्रस्तुत हो सका।

न्यायालय का स्पष्ट संदेश, कानून हाथ में लेने वालों को नहीं मिलेगी राहत-

न्यायालय के इस फैसले को कानून व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।फैसले ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पेड़ से बांधकर मारपीट जैसी अमानवीय घटना पर न्यायालय की कठोर टिप्पणी और सजा यह दर्शाती है कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका संवेदनशील और सख्त रुख अपना रही है।

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पीडि़त पक्ष को मिला न्याय-

फैसले के बाद पीडि़त परिवार ने राहत महसूस की है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर इस प्रकार की घटनाओं में साक्ष्य और गवाहों के अभाव में मामले कमजोर पड़ जाते हैं, लेकिन इस प्रकरण में पुलिस और अभियोजन की सक्रियता ने पीडि़त पक्ष को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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