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ऑपरेशन ‘लीपापोती’: करोड़ों के गबन की जांच अब उन्हीं के हवाले, जिनके सिर पर है घोटाले का सेहरा! उच्च शिक्षा विभाग का विवादास्पद आदेश बना चर्चा का विषय।

Priyanshu Ranjan

नवा रायपुर (विशेष खोजी रिपोर्ट): छत्तीसगढ़ का उच्च शिक्षा विभाग इन दिनों शिक्षा का केंद्र कम और भ्रष्टाचार की पनाहगाह ज्यादा नजर आ रहा है। शासन की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का जनाजा निकालते हुए, विभाग ने एक ऐसा शर्मनाक और आत्मघाती फरमान जारी किया है जो सीधे तौर पर संस्थागत लूट को कानूनी जामा पहनाने की एक सुनियोजित साजिश है। उच्च शिक्षा मंत्री श्री टंक राम वर्मा की नाक के नीचे एक ऐसा सिंडिकेट काम कर रहा है,

जिसका लब्बोलुआब सिर्फ एक है—’चोर ही करेगा अपनी चोरी की जांच’।

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लीपापोती का नया फरमान: 30 जून का आदेश
भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की इस क्रोनोलॉजी में सबसे नया अध्याय 30 जून 2026 को जुड़ा है। उच्च शिक्षा संचालनालय, नवा रायपुर द्वारा आदेश क्रमांक 897 (FINACC/8161/2026-AUDIT) जारी किया गया है। इस आदेश के तहत प्रदेश भर के दर्जनों शासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त हो रहे प्राचार्यों और प्रभारियों के कार्यकाल का विभागीय अंकेक्षण (ऑडिट) होना है।
हैरानी की बात यह है कि इस करोड़ों के बजट वाले ऑडिट का जिम्मा किसी स्वतंत्र एजेंसी, कैग (CAG) या चार्टर्ड एकाउंटेंट को नहीं, बल्कि अलग-अलग कॉलेजों के सहायक ग्रेड-1 और सहायक ग्रेड-2 के कर्मचारियों को सौंप दिया गया है। अपर संचालक (वित्त) जॉन तिग्गा के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी इस आदेश में इन बाबू-रूपी ऑडिटरों को यात्रा भत्ता (TA/DA) देने और महज 3 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

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सुर्खियां चीख रही हैं: गबन के महारथी बाबुओं का काला सच

विभाग का यह फैसला सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा इसलिए है, क्योंकि जिन ‘सहायक ग्रेड-1’ और ‘सहायक ग्रेड-2’ स्तर के कर्मचारियों को ऑडिट की चाबी सौंपी जा रही है, उनका अतीत गबन, फर्जीवाड़े और सस्पेंशन से भरा पड़ा है। मीडिया रिपोर्ट्स और हालिया खुलासे इस बात की पुख्ता गवाही देते हैं:

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कवर्धा पीजी कॉलेज का 1.22 करोड़ का महाघोटाला:

हाल ही में सामने आई रिपोर्ट ने यह साबित किया है कि कवर्धा के आचार्य पंत श्री ग्रिंद मुनि नाम साहिब पीजी कॉलेज में 1 करोड़ 22 लाख 69 हजार रुपये का भारी घोटाला हुआ है। इस खुले गबन को वित्तीय वर्ष 2019-20 से लेकर 2024-25 के बीच तत्कालीन प्राचार्य और उसी ‘सहायक ग्रेड-2’ के कर्मचारी ने मिलकर अंजाम दिया है, जिस कैडर को अब मंत्री जी ऑडिट का जिम्मा सौंप रहे हैं। छात्रों की खून-पसीने की कमाई और शुल्क राशि को बेरहमी से डकार लिया गया। हालांकि इन पर निलंबन और एफआईआर के निर्देश हुए हैं, लेकिन इससे पूरे सहायक ग्रेड कैडर की कार्यप्रणाली पर जो कालिख पुती है, उसे कैसे झुठलाया जा सकता है?

रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय का 20 लाख का गबन:

मीडिया रिपोर्ट्स चीख-चीख कर बता रही हैं कि कैसे रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 के क्लर्क आकाश श्रीवास्तव ने सुनियोजित जालसाजी कर करीब 18 से 20 लाख रुपये का गबन किया। इस बाबू ने शासकीय धन को पहले दैनिक वेतन भोगियों के खातों में डाला और फिर वहां से अपने निजी खातों में ट्रांसफर कर लिया। शिकायत के बाद दो-दो जांच कमेटियां बनीं, लेकिन लीपापोती कर दी गई।

कबीरधाम बोड़ला कॉलेज का 2 करोड़ का घोटाला:

दैनिक भास्कर की एक इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट साबित करती है कि बोड़ला कॉलेज में 10 साल से जमे बाबू आर.आर. भोसले ने बिना टेंडर के 31 लाख का फर्नीचर, 13 लाख का प्रैक्टिकल सामान, और 7 प्रिंटर खरीद डाले। छात्रों की फीस के 12 लाख रुपये बैंक में जमा कराने के बजाय निजी उपयोग में उड़ा दिए गए। इस पूरे 2 करोड़ के घोटाले में प्राचार्य से लेकर बाबू तक का सीधा नेक्सस सामने आया था।

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मंत्री टंक राम वर्मा की संदिग्ध भूमिका: मौन या खुला संरक्षण?

जब अखबारों के पन्ने और न्यूज़ चैनल्स की रिपोर्ट्स इन सहायक ग्रेड-1 और सहायक ग्रेड-2 के कर्मचारियों की रिश्वतखोरी, फर्जी बिलिंग और करोड़ों के गबन की कहानियों से पटे पड़े हैं, तो फिर इन्हीं कैडर के कर्मचारियों को ऑडिट अधिकारी क्यों बनाया जा रहा है?

इस पूरी पटकथा के मुख्य सूत्रधार के रूप में सीधे तौर पर उच्च शिक्षा मंत्री टंक राम वर्मा की भूमिका कटघरे में खड़ी हो जाती है। एक मंत्री के रूप में उनकी जवाबदेही थी कि वे शिक्षा के बजट में सेंधमारी करने वाले इन दागी बाबुओं पर चाबुक चलाते और बाहरी एजेंसियों से निष्पक्ष जांच कराते। लेकिन इसके उलट, उनकी सरपरस्ती में ऐसा आदेश निकला जिसने यह तय कर दिया कि भ्रष्ट सहायक ग्रेड कर्मचारी ही एक-दूसरे के कॉलेज का ऑडिट कर सारी गड़बड़ियों को ‘क्लीन चिट’ दे देंगे।

निष्कर्ष: तिजोरी की चाबी चोरों के हवाले

यह 30 जून 2026 का आदेश सिर्फ एक प्रशासनिक पत्र नहीं है, बल्कि प्रदेश के लाखों छात्रों के हक के पैसों पर खुलेआम डाका डालने का आधिकारिक लाईसेंस है। जब एक सहायक ग्रेड का कर्मचारी दूसरे बाबू और प्राचार्य के घोटालों की जांच करेगा, तो जाहिर है कि करोड़ों का गबन रद्दी की टोकरी में हमेशा के लिए गुम हो जाएगा। उच्च शिक्षा विभाग में पसरी इस खुली लूट को यदि तत्काल नहीं रोका गया और इस दागी आदेश को रद्द कर विभागीय कार्यालय, उच्च शिक्षा संचालनालय के स्तर पर निष्पक्ष जांच नहीं बिठाई गई, तो यह तय है कि इस संस्थागत महाघोटाले के छींटे सीधे तौर पर विभागीय मंत्री के दामन को तार-तार कर देंगे।

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क्या इस विवादास्पद आदेश को तुरंत प्रभाव से रद्द करने के लिए किसी उच्च-स्तरीय न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है?

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