– दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की दृष्टि से बस्तर संभाग सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र रहा है. लगभग पाँच दशकों तक नक्सली हिंसा और आतंक के बीच, अपनी जान की परवाह किए बिना जिस तरह यहाँ के पत्रकारों और रिपोर्टरों ने खबरों के लिए संघर्ष किया है, वैसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है. इसके पीछे परिस्थितियाँ भी बड़ी वजह रही हैं.
दुर्गम वन क्षेत्रों में, जहाँ सूर्य की रोशनी भी मुश्किल से पहुँच पाती हो, वहाँ से समाचार जुटाना और घटनाओं को कवर करना अत्यंत कठिन कार्य था. अबूझमाड़ जैसे बीहड़ इलाकों की इंच-इंच जमीन पर नक्सलियों के पदचिह्न मौजूद थे. उन्होंने वहाँ छोटे-बड़े सुरक्षित ठिकाने बना रखे थे और जगह-जगह बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं. ऐसी परिस्थितियों में वहाँ जाना मानो मृत्यु को निमंत्रण देने जैसा था.
इसके बावजूद बस्तर के पत्रकारों ने अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा और हर महत्वपूर्ण घटना की जानकारी देश-प्रदेश तक पहुँचाते रहे. यह भी सच है कि माओवादी पत्रकारों के प्रति अपेक्षाकृत विनम्र रुख रखते थे. अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से वे समय-समय पर संवाददाताओं को अपने गुप्त ठिकानों तक आमंत्रित करते थे.
मीडिया उनके लिए एक आवश्यकता थी, लेकिन जो खबरें उनके खिलाफ जातीं या उनके हितों के प्रतिकूल होतीं, उन्हें वे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते थे. पाँच दशकों के इस दौर में कई पत्रकार उनकी हिट लिस्ट में रहे, कुछ को प्रताड़ना झेलनी पड़ी और एक-दो हत्याओं की घटनाएँ भी सामने आईं. इसके बावजूद बस्तर की पुरानी और नई पीढ़ी के पत्रकारों ने अपने दायित्व का निर्वहन निरंतर किया.
दरअसल, नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र के पत्रकार दोतरफा खतरों के बीच जी रहे थे. एक ओर पुलिस उन्हें संदेह की दृष्टि से देखती थी, तो दूसरी ओर माओवादियों की नाराज़गी का भय बना रहता था. इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए ही वे तटस्थ रिपोर्टिंग कर पाते थे. उन्हीं की वजह से सघन वन क्षेत्रों के छोटे-बड़े गाँवों में घटित घटनाएँ, जैसे पुलिस-नक्सली मुठभेड़, आदिवासियों का शोषण और अत्याचार, नक्सलियों का गुरिल्ला युद्ध, सुरक्षा बलों पर हमले, सामूहिक हत्याएँ तथा जन अदालतों में कथित मुखबिरों को दी जाने वाली भयावह सजाएँ, शहरों के अखबारों की सुर्खियाँ बनती रहीं.
झीरम, रानीबोदली और ताड़मेटला जैसी कई दिल दहला देने वाली घटनाओं के बाद फॉलोअप खबरों के लिए राष्ट्रीय मीडिया भी स्थानीय रिपोर्टरों पर निर्भर रहा. झीरम सामूहिक हत्याकांड की पहली विस्तृत खबरें और तस्वीरें जगदलपुर के युवा संवाददाता नरेश मिश्रा के माध्यम से सामने आईं, जो घटनास्थल पर सबसे पहले पहुँचे थे. पत्रकारों ने पुलिस की फर्जी मुठभेड़ों का भी पर्दाफाश किया, जिनमें आदिवासियों को नक्सली बताकर मार दिया गया था. बीजापुर जिले के पोंजेर की घटना इसका उदाहरण है, जहाँ सात आदिवासियों की हत्या कर शवों को जमीन में दफना दिया गया था, इस घटना को दंतेवाड़ा के युवा रिपोर्टर सुरेश महापात्र ने उजागर किया.
बस्तर के पत्रकार नक्सलवाद के उदय से लेकर उसके चरम और वर्तमान स्थिति तक के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं. आधी सदी तक भय और आतंक से जूझते इस क्षेत्र ने अत्याचार, हिंसा, शोषण और दमन की अनगिनत भयावह घटनाएँ देखी हैं.
वर्ष 2014 में केंद्र में बनी सरकार ने नक्सल समस्या को उच्च प्राथमिकता दी. 2023 में छत्तीसगढ़ में पुनः सरकार बनने के बाद नक्सल उन्मूलन के लिए दो वर्ष की समय सीमा निर्धारित की गई. इसके बाद केंद्र और राज्य के सशस्त्र बलों ने व्यापक अभियान चलाते हुए बस्तर को एक तरह से युद्ध क्षेत्र में बदल दिया. नक्सलियों को कमजोर करने के लिए सबसे पहले उनकी सप्लाई लाइन को काटा गया और सूचना तंत्र को सुदृढ़ किया गया. इसके आधार पर उनके गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए सुनियोजित अभियान चलाए गए.
निर्धारित समय सीमा 31 मार्च 2026 तक आते-आते अधिकांश बड़े माओवादी कमांडर या तो मारे गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति के चलते संगठन का नेतृत्व बिखर गया और अंततः शेष नक्सलियों को भी आत्मसमर्पण करना पड़ा. आज बस्तर लगभग नक्सल मुक्त हो चुका है. आधी सदी से चली आ रही इस गंभीर समस्या का दो वर्षों में समाधान एक बड़ी उपलब्धि है. इसका श्रेय जहाँ सरकार और सुरक्षा बलों को जाता है, वहीं बस्तर के पत्रकारों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने कई महत्वपूर्ण अवसरों पर दोनों पक्षों के बीच पुल का काम किया. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि उनका सहयोग न मिला होता, तो यह अभियान और लंबा खिंच सकता था.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च को लोकसभा में नक्सल समस्या के ‘लगभग’ समाप्त होने की घोषणा की, जबकि राज्य के गृह मंत्री इसे पूरी तरह समाप्त होने का दावा कर रहे हैं.
यदि नक्सल आतंकवाद के संदर्भ में पत्रकारों की भूमिका देखें, तो स्पष्ट होता है कि जब-जब सरकार को उनकी आवश्यकता पड़ी, वे आगे आए. नक्सलियों द्वारा अपहृत पुलिस इंस्पेक्टर प्रकाश सोनी की रिहाई पत्रकारों की मध्यस्थता से ही संभव हो सकी, यह आपसी विश्वास का बड़ा उदाहरण है. ऐसे और भी कई मामले हैं, जहाँ उनकी भूमिका निर्णायक रही.
डिजिटल युग से पहले, प्रिंट मीडिया के दौर में सभी प्रमुख अखबार रायपुर से प्रकाशित होते थे और उनके अलग-अलग संस्करण नहीं थे. उस समय गाँवों और छोटे शहरों में तैनात संवाददाता ही घटनाओं को कवर करते थे. बस्तर में 1980 के दशक के बाद के संवाददाताओं में किरीट दोशी, बसंत अवस्थी, भरत अग्रवाल, राजेंद्र वाजपेई, सुरेश महापात्र, वीरेंद्र मिश्र, नरेश मिश्रा और सनत चतुर्वेदी जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने निडर पत्रकारिता की मिसाल पेश की.
समय के साथ खतरे बढ़ते गए, और 2005 से 2018 के बीच बस्तर लगभग पूर्णतः संघर्ष क्षेत्र बन गया. इस दौरान अनेक भीषण घटनाएँ हुईं, जिनमें हजारों लोग मारे गए. परिणामस्वरूप बस्तर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए केंद्र बन गया.
पिछले एक दशक में डिजिटल मीडिया के पत्रकारों ने जमीनी रिपोर्टिंग के माध्यम से बस्तर की वास्तविक तस्वीर सीधे लोगों तक पहुँचाई. इससे न केवल खबरों की विश्वसनीयता बढ़ी, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि वे निष्पक्ष संवाददाता हैं. मोटरसाइकिलों पर सवार होकर दूर-दराज के वन क्षेत्रों में पहुँचकर उन्होंने साहसिक पत्रकारिता का उदाहरण प्रस्तुत किया.
बस्तर जंक्शन के दिवंगत मुकेश चंद्राकर, उनके भाई युकेश चंद्राकर, बस्तर टॉकीज़ के रानू (विकास) तिवारी, सुरेश महापात्र, गणेश मिश्रा, सलीम शेख, राजा राठौर, बप्पी राय, के. शंकर और रौनक शिवहरे सहित अनेक युवा पत्रकारों ने यूट्यूब के माध्यम से लाइव रिपोर्टिंग कर व्यापक प्रभाव डाला. वहीं राष्ट्रीय मीडिया के पत्रकार जैसे रूचिर गर्ग, सुदीप ठाकुर, आलोक पुतुल, आशुतोष भारद्वाज, रितेश मिश्रा, रश्मि ड्रोलिया और सुप्रिया शर्मा ने भी घटनास्थलों से रिपोर्टिंग कर सच्चाई को सामने रखा.
नक्सल आंदोलन के अंतिम चरण में सरकार की ओर से बार-बार आत्मसमर्पण की अपील की गई. इस दौरान अनौपचारिक संवाद के लिए कुछ पत्रकार मध्यस्थ बने. यह कहना अधिक उचित होगा कि वे राष्ट्रहित में स्वप्रेरणा से आगे आए. विशेष रूप से रानू तिवारी, अंकुर तिवारी और रौनक शिवहरे ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने नक्सली कमांडरों से संवाद स्थापित किया और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया. पापाराव और देवजी जैसे कुख्यात नक्सली नेताओं के साक्षात्कार लेकर उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया.
इन प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता गया. इस प्रकार छत्तीसगढ़ में नक्सल उन्मूलन का श्रेय जहाँ सरकार और सुरक्षा बलों को जाता है, वहीं बस्तर के पत्रकारों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है.
दरअसल, यह केवल एक सुरक्षा अभियान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उन अनगिनत पत्रकारों की भी कहानी है, जिन्होंने बंदूक और बारूद के साये में सच को जिंदा रखा. वे सिर्फ खबर लिखने वाले लोग नहीं थे, बल्कि कभी जोखिम उठाकर, कभी विश्वास बनाकर, दो विरोधी दुनिया के बीच संवाद का माध्यम बने.
आधी सदी तक चले इस संघर्ष में जब गोलियों की आवाज़ें गूंजती रहीं, तब इन्हीं पत्रकारों ने शब्दों के माध्यम से उस अंधेरे को दर्ज किया, ताकि सच कहीं खो न जाए.
आज जब बस्तर ‘लगभग’ नक्सल मुक्त होने की दहलीज पर खड़ा है, तब यह याद रखना ज़रूरी है कि इस मुकाम तक पहुँचने में केवल रणनीतियाँ और हथियार ही नहीं, बल्कि साहस, संतुलन और सच्चाई के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही निर्णायक रही है. बस्तर के इन पत्रकारों ने यह साबित किया है कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जोखिम भरे समय में लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज़ भी होती है और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है.
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दिवाकर मुक्तिबोध जी के फेसबुक वाल से साभार
