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‘इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित विश्रामपुर क्षेत्र अब बड़े पैमाने पर हो रहे पेड़ कटाई के कारण सुर्खियों में,,,

Priyanshu Ranjan

स्थानीय नागरिकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की जांच व कार्यवाही की मांग

सूरजपुर । सरगुजा संभाग में बढ़ती गर्मी, सूखते जलस्रोत और लगातार घटती हरियाली के बीच विश्रामपुर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का मामला सुर्खियों में आ गया है। जिस क्षेत्र को कभी उत्कृष्ट वनीकरण और पर्यावरण संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला था, वहीं अब हरियाली उजड़ने के आरोप लग रहे हैं।
स्थानीय लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि विश्रामपुर क्षेत्र में वर्षों पहले लगाए गए हजारों वृक्षों को सुनियोजित तरीके से काटा जा रहा है। सोशल मीडिया में वायरल हो रही पोस्टों और स्थानीय चर्चाओं के बाद यह मुद्दा तेजी से तूल पकड़ रहा है। लोगों का आरोप है कि कुछ अधिकारियों, दलालों और संरक्षण प्राप्त लोगों की मिलीभगत से हरे-भरे वृक्षों को काटकर लकड़ी का कारोबार किया जा रहा है। हालांकि इस पूरे मामले में अब तक किसी जिम्मेदार विभाग की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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कभी हरियाली की पहचान था जयनगर मोड़ क्षेत्र…

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स्थानीय नागरिक बताते हैं कि अंबिकापुर से विश्रामपुर जाने वाले मार्ग पर जयनगर मोड़ के आसपास स्थित ऊंचे- ऊंचे टीले कभी घने वृक्षों और हरियाली से ढके रहते थे। कोयला उत्खनन के बाद पर्यावरणीय नियमों के तहत विश्रामपुर कोलियरी द्वारा बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया था। वर्षों की मेहनत से यह क्षेत्र हराभरा बना और प्रदूषण नियंत्रण में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
विश्रामपुर कोलियरी के इसी प्रयास को देखते हुए भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वर्ष 2005-06 में ‘इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया था। यह पुरस्कार उन संस्थाओं को दिया जाता है जिन्होंने वनीकरण और बंजर भूमि के विकास में उत्कृष्ट कार्य किया हो। उस समय विश्रामपुर क्षेत्र को पर्यावरण संरक्षण का मॉडल माना जाता था।

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सिर्फ उद्योगों को दोष देना पर्याप्त नहीं

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि सरगुजा में बढ़ती भीषण गर्मी के लिए केवल उद्योगों या बड़ी कंपनियों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई भी इसके पीछे एक बड़ा कारण है। उनका कहना है कि संभाग में कहीं वनाधिकार पट्टों के नाम पर तो कहीं भू- माफियाओं और अवैध कब्जों के कारण जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं। विश्रामपुर क्षेत्र को इसका सबसे बड़ा उदाहरण बताते हुए लोगों ने कहा कि यदि समय रहते हरियाली बचाने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय संकट और गंभीर हो जाएगा।

वर्तमान प्रबंधन पर भी उठे सवाल

लोगों ने विश्रामपुर क्षेत्र के वर्तमान प्रबंधन पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पूर्व अधिकारियों ने वर्षों मेहनत कर हजारों पेड़ लगाए, लेकिन वर्तमान में उन्हीं पेड़ों को कटवाकर मुनाफा कमाने का काम किया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों ने पूछा कि वर्तमान अधिकारियों ने अपने कार्यकाल में कितने नए वृक्ष लगाए हैं और पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या ठोस प्रयास किए हैं। उनका कहना है कि केवल पुराने वृक्षों को खत्म कर देना प्रबंधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढि़यों के साथ अन्याय है।

जनप्रतिनिधियों और पर्यावरण प्रेमियों की चुप्पी पर सवाल

इस पूरे मामले में जन प्रतिनिधियों, पर्यावरण संगठनों और जिम्मेदार विभागों की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब हसदेव अरण्य जैसे बड़े मुद्दों पर आवाज उठाई जाती है, तो अपने आसपास उजड़ते जंगलों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जानी चाहिए। कुछ लोगों ने बलरामपुर के आलोक बाजपेयी के कार्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि अवैध कटाई रोकने के लिए सख्ती जरूरी है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन चाहे तो अवैध कटाई पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

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जांच और कार्रवाई की मांग

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में नियमों को दरकिनार कर पेड़ों की कटाई की जा रही है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लोगों ने चेतावनी दी कि यदि इसी तरह जंगल खत्म होते रहे तो सरगुजा में तापमान लगातार बढ़ेगा, जल संकट गहराएगा और पर्यावरणीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। उन्होंने आम जनता से भी हरियाली बचाने के लिए जागरूक होने की अपील की है।

अब हरियाली की जगह दिख रहे ठूंठ…

स्थानीय लोगों का कहना है कि आज वही क्षेत्र तेजी से उजड़ता नजर आ रहा है। जहां कभी घने पेड़ और हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब पेड़ों के कटे हुए ठूंठ नजर आने लगे हैं। लोगों का आरोप है कि धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र की हरियाली समाप्त की जा रही है और इसकी आड़ में लाखों रुपए का खेल चल रहा है। लोगों का यह भी कहना है कि अगर किसी सामान्य ग्रामीण द्वारा एक पेड़ काटा जाए तो वन विभाग और प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता है, लेकिन बड़े स्तर पर हो रही कटाई के बावजूद जिम्मेदार विभाग मौन क्यों हैं, यह बड़ा सवाल है।

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