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बलरामपुर के कद्दावर नेता संजीव गुप्ता के जिला महामंत्री पद से इस्तीफा देने पर जिला कांग्रेस में मचा घमासान,

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बलरामपुर । जिला कांग्रेस कमेटी एक बार फिर सुखियों में है. सुर्खियों की वजह कोई नई नहीं है. इस बार जिला कार्यकारिणी में शामिल जिला महामंत्री संजीव गुप्ता ने पद से इस्तीफा दिया है. इस संबंध में संजीव गुप्ता ने अपना इस्तीफा पार्टी जिलाध्यक्ष को भेज दिया है. हालांकि, उनका इस्तीफा मंजूर किया गया है या नही इस पर संशय बरकरार है.
बलरामपुर कांग्रेस में संजीव गुप्ता किसी पहचान के मोहताज नहीं है. वे लंबे समय से कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में जुड़े रहे है. पूर्व विधायक बृहस्पत सिंह के करीबियों में से एक संजीव गुप्ता ने बृहस्पत सिंह के पार्टी से निष्कासन के बाद भी हाथ का साथ नही छोड़ा था और इस बार तो उन्हें नये जिलाध्यक्ष हरिहर यादव की टीम में मौका मिला था, लेकिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
संजीव गुप्ता ने अपने इस्तीफे में लागलपेट वाला हवाला नहीं दिया है. जैसा कि हर बार इस्तीफों में लिखा जाता है. बल्कि उनके इस्तीफे ने कांग्रेस के अंदर जंग छेड़ कर रख दी है. संजीव गुप्ता ने पार्टी नेतृत्व को यह बताने की कोशिश की है कि हरिहर प्रसाद यादव की टीम में जमीनी स्तर के और वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा हुई है और ऐसे लोगों को कार्यकारिणी में मौका दिया गया है जो पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल रहे है.

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जब तूती बोलती थी, फिर भी कुछ नहीं था सही

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बता दें कि बलरामपुर ऐसा जिला रहा जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. रामानुजगंज विधानसभा क्षेत्र से बृहस्पत सिंह और सामरी सीट से चिंतामणि महराज कांग्रेस के विधायक रहे और दोनों ही विधायकों की भूपेश सरकार में जमकर तू ती बोलती थी. जिले का कांग्रेस संगठन पार्टी आलाकमान के पास अपनी उपेक्षा का रोना रोते रहता. अब परिस्थितियां बदली है. बृहस्पत सिंह कांग्रेस से बाहर है. चिंतामणि महराज भाजपा के हो गये है. ऐसे समय में पार्टी ने रणनीति के तहत पिछड़ा वर्ग से आने वाले हरिहर को पार्टी में जान फूंकने अध्यक्ष बनाया है, लेकिन पार्टी आलाकमान के मंशानुरूप हो उल्टा रहा है और अब जरूरत है कि हरिहर अपना कुनबा बचा लें.

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बहरहाल पार्टी के महामंत्री का इस्तीफा खुद पार्टी जिलाध्यक्ष के लिए चुनौती है और उन्हें अपने नेतृत्व क्षमता का आंकलन करना होगा. उन्हें समझना होगा कि आखिर टीम मजबूत होने से पहले ही क्यों बिखर रही है. वैसे भी पार्टी को एक सजग विपक्ष की भूमिका में आने जी तोड़ मेहनत करनी होगी. ऐसे में रूठों को मना लिया जाए तो 2028 का विधानसभा चुनाव जीतने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

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