AAJ24

[state_mirror_header]

भैयाथन शाखा में हुई अनियमितता के मामले में सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर की भूमिका सवालों के घेरे में,

aaj24@nimble

सूरजपुर । सरगुजा संभाग में सहकारी बैंकिंग तंत्र एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। मामला जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित, अंबिकापुर की भैयाथान शाखा से जुड़ा है, जहाँ पिछले कई वर्षों से वित्तीय अनियमितताओं, संदिग्ध ऋण स्वीकृतियों और फसल बीमा प्रकरणों में गड़बड़ी के आरोप सामने आते रहे हैं। आरोपों का केंद्र एक पूर्व शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा को लेकर है, जिन पर धान खरीदी, गौ पालन ऋ ण वितरण और कथित फसल बीमा भुगतान से जुड़े मामलों में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगा, एफआईआर दर्ज हुई, निलंबन आदेश जारी हुआ, लेकिन इसके बाद की कार्रवाई और बैंक की भूमिका को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

- Advertisement -

35 लाख 78 हजार रुपये, रकम ज्यादा नहीं लगती जब सरकारी बजट की बात होती है, लेकिन जब यही राशि किसानों की फसल बीमा की हो तब हर रुपया भरोसे का प्रतीक बन जाता है। यही राशि आज सरगुजा संभाग के सहकारी तंत्र पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। मामला जुड़ा है जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित, अंबिकापुर की भैयाथान शाखा से, और सुनवाई हुई संयुक्त पंजीयन सहकारी संस्था सरगुजा संभाग के समक्ष। इस पूरे घटनाक्रम में पूर्व शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा का नाम प्रमुख रूप से सामने आया । अब सवाल यह है कि घोटाला हुआ था? या सिर्फ प्रक्रिया गलत थी? और अगर प्रक्रिया गलत थी, तो जिम्मेदार कौन?

- Advertisement -

आपराधिक मामला अलग है…

ध्यान देने योग्य है कि विभागीय कार्रवाई शून्य होने का अर्थ यह नहीं कि आपराधिक मामला स्वतः समाप्त हो गया। यदि एफआईआर दर्ज है, तो जांच एजेंसी और न्यायालय की प्रक्रिया अलग चलेगी। लेकिन यहां भी प्रश्न है की क्या पुलिस जांच में प्रगति हुई? क्या चार्जशीट दाखिल हुई? क्या मामला लंबित है? सार्वजनिक पारदर्शिता के बिना संदेह बढ़ते हैं।

See also  गांधी नगर पुलिस बाईक चोरी के दो अलग अलग मामले में पांच आरोपियों को किया गिरफ्तार

क्या बहाली संभव है?

यदि विभागीय आदेश शून्य है, तो संबंधित कर्मचारियों की सेवा स्थिति पर पुनर्विचार हो सकता है। लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए, क्या आपराधिक मामला लंबित रहते हुए सेवा बहाल होगी? क्या नई जांच प्रक्रिया शुरू की जाएगी? क्या वित्तीय जिम्मेदारी स्पष्ट किए बिना नियुक्ति होगी? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि विभागीय कार्रवाई शून्य होना अंतिम निर्णय नहीं है। बैंक चाहे तो नियमानुसार नई प्रक्रिया शुरू कर सकता है।

राजनीतिक परछाईं?

जनचर्चा में यह भी कहा जा रहा है कि कार्रवाई की शुरुआत एक दौर में हुई और दूसरे दौर में कानूनी रूप से ढीली पड़ गई, हालांकि ऐसे आरोप सिद्ध नहीं हैं, लेकिन यह धारणा बनना भी तंत्र के लिए खतरे की घंटी है, यदि सिस्टम पारदर्शी हो, तो अफवाहें नहीं फैलतीं।

सहकारी बैंक की साख दांव पर…

सहकारी बैंक किसानों की रीढ़ माने जाते हैं । धान भुगतान, ऋण बीमा, सब इसी तंत्र से जुड़े हैं। यदि जांच मजबूत नहीं, प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण, अपील अस्पष्ट, वसूली अधूरी तो नुकसान सिर्फ एक शाखा का नहीं, पूरे तंत्र का है।

मामला व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है…

यह केवल जगदीश कुशवाहा या चार कर्मचारियों का मामला नहीं है, यह सहकारी बैंकिंग तंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा है, यदि घोटाला हुआ तो जिम्मेदार तय होना चाहिए, यदि प्रक्रिया गलत थी तो प्रक्रिया बनाने वाले पर कार्रवाई होनी चाहिए, यदि कर्मचारी निर्दोष हैं तो स्पष्ट रूप से निर्दोष घोषित होना चाहिए। लेकिन प्रक्रिया की गलती के नाम पर मामला अधर में नहीं रहना चाहिए, 35.78 लाख रुपये की यह कहानी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं यह उस विश्वास की कहानी है जो किसान बैंक में जमा करता है, और जब विश्वास हिलता है तो सिर्फ बैंक नहीं, पूरा तंत्र कटघरे में खड़ा होता है।

See also  सैलाना में फार्म हाउस पर जुए के अड्डे पर दबिश, 21 आरोपी गिरफ्तार, ढाई लाख के करीब नगद, 01 कार, 05 मोटर साईकल जब्त

मामला कैसे शुरू हुआ?

वर्ष 2019-20 में किसानों की फसल बीमा राशि के वितरण में लगभग 35.78 लाख की अनियमितता सामने आई, जांच हुई, कलेक्टर स्तर पर जांच दल गठित हुआ, रिपोर्ट में गड़बड़ी दर्ज की गई, इसके बाद एफआईआर दर्ज हुई, भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराएं जोड़ी गईं, संबंधित कर्मचारियों को निलंबित किया गया, 5 जून 2023 को सेवा समाप्ति आदेश जारी हुआ, संदेश साफ था मामला गंभीर है।

तीन साल बाद क्या बदला?

तीन साल तक कार्रवाई की प्रक्रिया चलती रही, फिर 23 जनवरी 2025 को न्यायालय में आदेश आया, विभागीय कार्रवाई शून्य घोषित, कारण? प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण पालन नहीं हुआ, व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं की गई, विभागीय प्रक्रिया में त्रुटियां रहीं, ध्यान देने योग्य बात यह है कि न्यायालय ने यह नहीं कहा कि घोटाला नहीं हुआ, न ही यह कहा कि कर्मचारी निर्दोष हैं, उसने सिर्फ इतना कहा प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी।

बड़ा सवालः प्रक्रिया गलत थी तो जिम्मेदार कौन?

यदि विभागीय कार्रवाई तकनीकी रूप से कमजोर थी, तो जांच रिपोर्ट तैयार करने वाला कौन था? आरोप पत्र किसने बनाया? सेवा समाप्ति का आदेश किसने अनुमोदित किया? क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? यदि प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी, तो सिर्फ कर्मचारियों की बहाली ही समाधान नहीं हो सकती, प्रक्रिया बनाने वाले पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

बैंक की भूमिकाः क्या अपील की गई?

यहां से मामला और गंभीर हो जाता है, जब न्यायालय ने विभागीय कार्रवाई शून्य की, तब क्या बैंक ने उच्च मंच पर अपील की? यदि नहीं की तो क्यों? यदि की तो स्थिति क्या है? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि बैंक ने न्यायालय में अपना पक्ष पूरी मजबूती से प्रस्तुत नहीं किया, यदि यह सही है, तो यह केवल कानूनी चूक नहीं, किसानों के हित की अनदेखी है।

See also  रतलाम में दूध उत्पादक संघ ने की बैठक,राखी से 5 रुपए प्रति लीटर महंगा होगा दूध ;नए अध्यक्ष बने ईश्वर लाल गुर्जर

क्या सीईओ और सहकारिता तंत्र की भूमिका जांच के घेरे में?

अब सवाल बैंक प्रबंधन और सहकारिता विभाग तक पहुंच रहा है, क्या जिला सहकारी बैंक के सीईओ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया? क्या अपील की दिशा में ठोस पहल हुई? क्या संयुक्त आयुक्त सहकारिता और संयुक्त पंजीयन स्तर पर प्रक्रिया की त्रुटियों की समीक्षा की गई? यदि नहीं तो यह प्रशासनिक कमजोरी है, यदि हां तो सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं?

वसूली का क्या हुआ?

मामले की जड़ में 35.78 लाख रुपये की राशि है, यदि जांच में अनियमितता दर्ज थी, तो कितनी राशि की वसूली हुई? क्या रिकवरी नोटिस जारी हुए? क्या वित्तीय दायित्व तय किया गया? यदि विभागीय आदेश शून्य हो गया, तो क्या वसूली भी शून्य हो जाएगी? किसानों का हित सबसे ऊपर होना चाहिए, यह सिद्धांत सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रह सकता।

Share This Article