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सरगुजा में शासकीय जमीन की कथित कूटरचना का मामला: आजाद इराकी समेत पांच क्रेता-विक्रेताओं पर FIR के निर्देश

Priyanshu Ranjan

मैनपाट के ग्राम केसरा में 3.460 हेक्टेयर भूमि का मामला, कलेक्टर ने राजस्व रिकॉर्ड से कथित अवैध प्रविष्टि हटाने के भी दिए निर्देश

1954-55 के अधिकार अभिलेख और 1995-96 के बंदोबस्त रिकॉर्ड में सामने आया अंतर, 2022 की रजिस्ट्री और निरस्त नामांतरण भी जांच के दायरे में

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अंबिकापुर। सरगुजा जिले के मैनपाट तहसील अंतर्गत ग्राम केसरा में शासकीय भूमि को कथित रूप से राजस्व अभिलेखों में कूटरचना के जरिए निजी संपत्ति के रूप में दर्ज कराने और बाद में उसकी रजिस्ट्री किए जाने का मामला सामने आया है। प्रकरण में कलेक्टर सरगुजा ने आजाद इराकी सहित कुल पांच क्रेता-विक्रेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश तहसीलदार मैनपाट को दिए हैं। इसके साथ ही संबंधित राजस्व अभिलेखों में दर्ज कथित अवैध प्रविष्टि को विलोपित करने के लिए भी आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

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मामला ग्राम केसरा स्थित खसरा नंबर 1378 की 3.460 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। शिकायतकर्ता आलोक दुबे ने आरोप लगाया था कि शासकीय मद में दर्ज भूमि को राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से निजी भूमि के रूप में दर्ज कराया गया और बाद में उसका विक्रय कर दिया गया। शिकायत पर तहसीलदार मैनपाट से जांच प्रतिवेदन प्राप्त किया गया। प्रशासनिक जांच में पुराने अधिकार अभिलेखों और बाद के राजस्व दस्तावेजों के बीच अंतर सामने आने के बाद कलेक्टर ने प्राथमिकी दर्ज कराने तथा राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के निर्देश दिए हैं।

1954-55 के रिकॉर्ड में नहीं था खसरा नंबर 1378

इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू वर्ष 1954-55 का अधिकार अभिलेख है। तहसीलदार मैनपाट के जांच प्रतिवेदन के अनुसार, उस समय के अधिकार अभिलेख में अंतिम खसरा नंबर 650 तक दर्ज था। ऐसे में वर्तमान में विवादित खसरा नंबर 1378 की प्रविष्टि उस अभिलेख में मौजूद नहीं थी।

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जांच प्रतिवेदन में खसरा नंबर 1378 को रिनंबरिंग खसरा बताया गया है, जो वर्ष 1995-96 के राजस्व दस्तावेजों में सामने आया। इसके बाद पुराने और नए अभिलेखों के बीच भूमि की पहचान, स्वामित्व तथा उसकी राजस्व श्रेणी को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि पुराने अधिकार अभिलेखों में कथित कूटरचना कर जमीन को विजय सिंह पिता चंद्रचरण सिंह के नाम दर्ज कराया गया। इस आरोप की पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का निर्धारण पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगा।

1995-96 के बंदोबस्त में छोटे झाड़ के जंगल के रूप में दर्ज थी जमीन

जांच प्रतिवेदन में वर्ष 1995-96 के बंदोबस्त रिकॉर्ड का भी उल्लेख है। इसके अनुसार, खसरा नंबर 1378 की 3.460 हेक्टेयर भूमि छोटे झाड़ के जंगल यानी शासकीय मद में दर्ज थी। प्रतिवेदन में बताया गया है कि यह खसरा नंबर 576 से निर्मित हुआ था।

पुराने सेटलमेंट रिकॉर्ड में खसरा नंबर 576 की 84.38 एकड़ भूमि गोचर यानी शासकीय मद में दर्ज होने का उल्लेख है। इसके बाद वर्ष 1995-96 के बंदोबस्त में खसरा नंबर 1378 को छोटे झाड़ के जंगल की श्रेणी में दर्ज किया गया।

इन अभिलेखों के आधार पर अब यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि जमीन को निजी स्वामित्व में दर्ज करने के लिए किन दस्तावेजों का सहारा लिया गया और संबंधित प्रविष्टियों को किस प्रक्रिया के तहत प्रमाणित किया गया। खसरा पंचशाला, अधिकार अभिलेख, बंदोबस्त रिकॉर्ड और नामांतरण से संबंधित दस्तावेजों का मिलान इस मामले में अहम माना जा रहा है।

विजय सिंह के नाम प्रविष्टि से लेकर रजिस्ट्री तक की जांच

प्रशासनिक जांच प्रतिवेदन के मुताबिक, संबंधित भूमि विजय सिंह पिता चंद्रचरण सिंह के नाम दर्ज किए जाने के बाद उसके विक्रय से संबंधित दस्तावेज सामने आए। शिकायत और जांच में दिलीप चिकवा तथा तुलेश्वर गुप्ता के नाम मुख्तार आम के रूप में उल्लेखित हैं।

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उपलब्ध प्रशासनिक विवरण के अनुसार, 20 सितंबर 2022 को भूमि की रजिस्ट्री आजाद इराकी पिता रियाजुद्दीन इराकी और अनुपम कुमार सिंह के पक्ष में किए जाने का उल्लेख है। इसके बाद तहसीलदार मैनपाट ने 6 अक्टूबर 2022 को नामांतरण निरस्त कर दिया था। जांच प्रतिवेदन में 1 मई 2024 को पावर ऑफ अटॉर्नी से संबंधित दस्तावेज निष्पादित किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।

इस घटनाक्रम के बाद जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया, रजिस्ट्री में प्रस्तुत दस्तावेजों और नामांतरण के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस जांच में यह परीक्षण किया जाना आवश्यक होगा कि भूमि के पुराने शासकीय रिकॉर्ड की जानकारी संबंधित पक्षों को थी या नहीं और निजी स्वामित्व की प्रविष्टि किन दस्तावेजों के आधार पर की गई।

आलोक दुबे की शिकायत के बाद हुई प्रशासनिक जांच

शिकायतकर्ता आलोक दुबे ने कलेक्टर सरगुजा को आवेदन देकर ग्राम केसरा की शासकीय भूमि को कथित कूटरचना के जरिए निजी संपत्ति के रूप में दर्ज किए जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने पुराने राजस्व अभिलेखों और बाद में हुए भूमि हस्तांतरण की जांच कराने, जमीन को शासकीय घोषित करने तथा जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी।

शिकायत के बाद तहसीलदार मैनपाट से जांच प्रतिवेदन मंगाया गया। जांच में सामने आए अभिलेखीय तथ्यों के आधार पर अब प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश जारी किए गए हैं।

प्रकरण में शिकायतकर्ता की ओर से उठाए गए सवालों के साथ-साथ मूल राजस्व दस्तावेजों की प्रमाणिकता, संबंधित प्रविष्टियों के आधार और भूमि हस्तांतरण की वैधानिकता की जांच भी महत्वपूर्ण होगी।

वन संरक्षण संबंधी प्रावधानों की भी होगी पड़ताल

विवादित भूमि के छोटे झाड़ के जंगल यानी शासकीय मद में दर्ज होने के उल्लेख के कारण भूमि की वास्तविक कानूनी श्रेणी की पुष्टि भी जरूरी है। इसके लिए संबंधित राजस्व और वन विभाग के अभिलेखों का परीक्षण किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

यदि जांच में भूमि पर वन संरक्षण संबंधी कानूनों के प्रावधान लागू होना पाया जाता है, तो हस्तांतरण की वैधता की जांच उन प्रावधानों और संबंधित न्यायालयों के निर्देशों के अनुरूप करनी होगी। इस संबंध में यह भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि भूमि के उपयोग अथवा हस्तांतरण के लिए कोई वैधानिक अनुमति या सक्षम प्राधिकारी का आदेश मौजूद था या नहीं।

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कलेक्टर के दो अहम निर्देश: प्राथमिकी और रिकॉर्ड में सुधार

कलेक्टर सरगुजा की कार्रवाई के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, तहसीलदार मैनपाट को आजाद इराकी सहित कुल पांच क्रेता-विक्रेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं। इससे कथित कूटरचना और भूमि हस्तांतरण से जुड़े मामले की पुलिस जांच का रास्ता खुलेगा।

दूसरा, राजस्व अभिलेखों में दर्ज कथित अवैध प्रविष्टि को विलोपित करने के लिए संबंधित राजस्व अधिकारी को निर्देशित किया गया है। इसके तहत लागू नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अभिलेखों की जांच कर आवश्यक सुधार किया जाना है।

हालांकि, प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश जारी होने मात्र से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं होता। पुलिस विवेचना में दस्तावेजों, हस्ताक्षरों, अभिलेखों की उत्पत्ति और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच के बाद ही तथ्य स्पष्ट हो सकेंगे।

नामांतरण निरस्त होने के बाद भी उठ रहे सवाल

तहसीलदार मैनपाट द्वारा 6 अक्टूबर 2022 को नामांतरण निरस्त किए जाने का उल्लेख भी जांच प्रतिवेदन में है। ऐसे में नामांतरण निरस्तीकरण आदेश, रजिस्ट्री दस्तावेज और पावर ऑफ अटॉर्नी से संबंधित कागजात की जांच महत्वपूर्ण होगी।

इन दस्तावेजों की तारीख, आधार और कानूनी प्रभाव का परीक्षण कर यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया में कथित अनियमितता कहां हुई और राजस्व अभिलेखों में सुधार की कार्रवाई किस स्तर तक की गई।

अब पुलिस विवेचना और राजस्व विभाग की आगामी कार्रवाई पर इस मामले की दिशा निर्भर करेगी। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब उपलब्ध पुराने बंदोबस्त रिकॉर्ड में भूमि शासकीय मद में दर्ज थी, तो बाद के दस्तावेजों में निजी स्वामित्व की प्रविष्टि किस आधार पर हुई। इसका जवाब मूल अभिलेखों के सत्यापन, संबंधित दस्तावेजों की जांच और निष्पक्ष विवेचना से ही सामने आएगा।

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