सरगुजा कांग्रेस का विवेकानंद प्रतिमा के सामने प्रदर्शन, ₹40 किलो अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने की मांग,
अंबिकापुर। रसोई के बढ़ते बजट और शक्कर की कीमतों को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी सरगुजा ने गुरुवार को अंबिकापुर में केंद्र सरकार के खिलाफ सत्याग्रह किया। जिला कांग्रेस अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रैली निकालकर विवेकानंद प्रतिमा के सामने विरोध प्रदर्शन किया और शक्कर की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
- सरगुजा कांग्रेस का विवेकानंद प्रतिमा के सामने प्रदर्शन, ₹40 किलो अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने की मांग,
- कांग्रेस का आरोप—सरकारी नीतियों का खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहा
- ‘प्यास लगने पर कुआं खोदने’ का तंज
- जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने उठाए कदम
- शक्कर की कीमतों पर आंकड़ों से अलग तस्वीर
- कांग्रेस की मांग—₹40 किलो तय हो अधिकतम खुदरा मूल्य
- सियासत से आगे सबसे बड़ा सवाल—राहत कब?
कांग्रेस ने दावा किया कि शक्कर की कीमतें कई जगह 40 से 78 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। हालांकि, उपलब्ध बाजार रिपोर्टों में अलग-अलग शहरों में खुदरा कीमतें इससे कम दायरे में बताई गई हैं। ऐसे में कीमतों को लेकर राजनीतिक दावों और वास्तविक बाजार दरों के बीच अंतर भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांग्रेस का आरोप—सरकारी नीतियों का खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहा
सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण घरेलू बाजार में शक्कर की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ा है। कांग्रेस ने इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और शक्कर के डायवर्जन, शक्कर के निर्यात तथा घरेलू स्टॉक से जुड़ी नीतियों पर सवाल उठाए।
हालांकि, केंद्र सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार का कहना है कि शक्कर की कीमतों में उतार-चढ़ाव को केवल इथेनॉल डायवर्जन से जोड़ना उचित नहीं है। सरकार के अनुसार इथेनॉल के लिए डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रहा है।
सरकार ने कीमतों पर दबाव के पीछे कम उत्पादन, त्योहारी मांग, मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति की स्थिति तथा जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कई कारण भी गिनाए हैं।
‘प्यास लगने पर कुआं खोदने’ का तंज
जिला कांग्रेस अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक ने केंद्र सरकार द्वारा कच्ची शक्कर के आयात के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे ‘प्यास लगने पर कुआं खोदने’ जैसा कदम बताया।
उन्होंने कहा कि आयातित शक्कर को देश में पहुंचने, रिफाइन होने और बाजार तक आने में समय लगेगा, जबकि आम उपभोक्ता को तत्काल राहत की जरूरत है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने अगस्त में 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची शक्कर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। आयातकों की शिपिंग संबंधी दिक्कतों को देखते हुए बाद में कच्ची शक्कर को रिफाइन कर घरेलू बाजार में बेचने की समय सीमा में भी बदलाव किया गया।
जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने उठाए कदम
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि शक्कर की कीमतों पर नियंत्रण और जमाखोरी रोकने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। शक्कर व्यापारियों पर स्टॉक सीमा लागू करने के साथ मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है।
सरकार के अनुसार 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं के लिए 15 दिनों की खपत से अधिक स्टॉक रखने पर रोक की व्यवस्था लागू की गई है। इसके अलावा 15 सितंबर से चीनी डीलरों की स्टॉक सीमा 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल करने की घोषणा भी की गई है।
सरकार का तर्क है कि इन उपायों से जमाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
शक्कर की कीमतों पर आंकड़ों से अलग तस्वीर
शक्कर की कीमतों को लेकर कांग्रेस और सरकार के दावों के बीच उत्पादन और खपत के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस का कहना है कि देश में लगभग 28 लाख मीट्रिक टन मासिक खपत के मुकाबले उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता की स्थिति है।
वहीं, उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने हाल में वास्तविक शक्कर की कमी से इनकार करते हुए कीमतों में तेजी के पीछे सट्टेबाजी और जमाखोरी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया है।
इससे साफ है कि शक्कर की कीमतों का मुद्दा किसी एक कारण तक सीमित नहीं है। उत्पादन, शुरुआती स्टॉक, त्योहारी मांग, निर्यात, इथेनॉल डायवर्जन, वैश्विक बाजार और जमाखोरी—इन सभी कारकों का असर बाजार पर पड़ सकता है।
कांग्रेस की मांग—₹40 किलो तय हो अधिकतम खुदरा मूल्य
कांग्रेस जिलाध्यक्ष बालकृष्ण पाठक ने केंद्र सरकार से शक्कर का अधिकतम खुदरा मूल्य 40 रुपये प्रति किलो निर्धारित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल अधिसूचना जारी कर इससे अधिक कीमत पर शक्कर बेचने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान करना चाहिए।
महिला कांग्रेस अध्यक्ष सीमा सोनी ने भी महंगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि रसोई के बजट पर बढ़ता बोझ सीधे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को प्रभावित कर रहा है।
सियासत से आगे सबसे बड़ा सवाल—राहत कब?
शक्कर की कीमतों को लेकर कांग्रेस का सत्याग्रह अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। विपक्ष सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है, जबकि केंद्र सरकार आयात, स्टॉक सीमा और निगरानी जैसे कदमों को कीमत नियंत्रित करने की दिशा में उठाए गए उपाय बता रही है।
लेकिन इस पूरे विवाद के बीच उपभोक्ता के लिए सबसे अहम सवाल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि बाजार में मिलने वाली वास्तविक कीमत है।
अगर पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और जमाखोरी पर कार्रवाई हो रही है, तो उपभोक्ता को राहत कब मिलेगी? और यदि नीतिगत फैसलों के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ा है, तो उन फैसलों की समीक्षा कब होगी?
आखिर आंकड़ों में शक्कर का हिसाब चाहे जितना उलझा हो, आम आदमी के लिए असली सवाल यही है—रसोई में महंगी होती शक्कर से राहत कब मिलेगी?




