सूरजपुर। जिले के सावारांवा धान खरीदी केंद्र में 32,838 क्विंटल धान की कमी का मामला अब महज अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा बन चुका है। कलेक्टर के स्पष्ट निर्देश के बावजूद 14 दिन बीत जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं होना यह संकेत देता है कि आदेशों की धार कागजों तक सीमित है या फिर कहीं न कहीं सिस्टम की इच्छा-शक्ति कमजोर पड़ रही है। कुल-मिलाकर यह मामला अब सिर्फ 32,838 क्विंटल धान का नहीं रहा। यह प्रशासन की साख, पारदर्शिता और किसानों के विश्वास का प्रश्न बन गया है।
कलेक्टर के आदेश के बाद भी एफआईआर दर्ज न होना यह संकेत देता है कि या तो आदेशों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा, या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था में संरक्षण की परत मौजूद है।
निरीक्षण में खुलासा, पर कार्रवाई क्यों नहीं..?
सूत्रों के मुताबिक सत्यापन के दौरान भारी मात्रा में धान की कमी सामने आई। निरीक्षण के समय केंद्र प्रभारी अनुपस्थित मिला। इसके बाद भी त्वरित आपराधिक प्रकरण दर्ज न होना कई सवाल खड़े करता है।चर्चा यह भी है कि प्रभारी को तबीयत खराब का हवाला देते हुए पत्र देने की सलाह दी जा रही है, ताकि समय मिल सके और परिस्थितियां अनुकूल की जा सकें। सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी मात्रा में धान गायब होने के बाद भी प्रशासन सहानुभूति की भूमिका में है..?
लिपापोती की आशंका: बाजार से खरीदकर भरपाई
अंदरखाने यह चर्चा तेज है कि गायब धान को बाजार से खरीद कर धीरे-धीरे केंद्र में रखा जा रहा है, ताकि दोबारा सत्यापन में कमी कम दिखाई दे। अपुष्ट सूत्र बताते हैं कि पुनः सत्यापन के लिए कलेक्टर को पत्र देने की तैयारी भी चल रही है।यदि यह सच है तो यह सिर्फ गड़बड़ी नहीं, बल्कि साक्ष्य मिटाने की कोशिश मानी जाएगी। सवाल यह भी है कि क्या जिला प्रशासन इस संभावित हेर-फेर पर नजर रखे हुए है..?
नोडल अधिकारी और ब्रांच मैनेजर की भूमिका पर प्रश्न
जिला सहकारी बैंक के नोडल अधिकारी संतोष जायसवाल का कहना है कि उन्हें कुछ दिनों पहले ही कलेक्टर के आदेश की जानकारी प्राप्त हुई है और उन्होंने बैंक शाखा ओड़गी प्रबंधक से संपर्क किया तो उनके द्वारा हेड ऑफिस को पत्र लिखा गया है, जवाब आने पर बताएंगे। लेकिन जब कलेक्टर सीधे एफआईआर के निर्देश दे चुके हैं, तब हेड ऑफिस के जवाब का इंतजार क्यों..? क्या आपराधिक कृत्य के लिए प्रशासनिक अनुमति जरूरी है..? वहीं दूसरी तरफ ओड़गी शाखा के ब्रांच मैनेजर और संबंधित विभाग के अधिकारी स्पष्ट जवाब देने से बच रहे हैं। जिम्मेदारी तय करने की बजाय जिम्मेदारी टालने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। कुल-मिलाकर क्या यह प्रशासनिक समन्वय की कमी है या फिर सुनियोजित देरी..?
सीसीटीवी बंद, निगरानी ठप
सूत्रों का दावा है कि खरीदी केंद्र में लगे कुछ सीसीटीवी कैमरे कई दिनों से बंद हैं। यदि कैमरे बंद थे तो उसकी सूचना किसे दी गई.? मरम्मत क्यों नहीं हुई..? दरअसल यह सब कैमरे की नजर से बचकर केंद्र में धान वापस धीरे-धीरे भंडारण बीते करीब 7 से 8 दिनों से चल रहा है। वहीं दूसरी तरफ धान का उठाव और भंडारण जारी रहने के बावजूद निगरानी व्यवस्था ठप रहना संदेह को और गहरा करता है। क्या यह तकनीकी लापरवाही है या सुनियोजित चूक..?
राइस मिलर कनेक्शन..?
चर्चाएं यह भी हैं कि एक प्रभावशाली राइस मिलर की भूमिका संदिग्ध है और वह केंद्र प्रभारी को बचाने में सक्रिय है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि सांठ-गांठ के संकेत मिलते हैं तो यह नेटवर्क स्तर की गड़बड़ी मानी जाएगी।
उमेश्वरपुर में तत्परता, सावारांवा में सन्नाटा क्यों?
उमेश्वरपुर सहकारी समिति में अनियमितता सामने आते ही तत्काल एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की गई थी। वहीं सावारांवा में करोड़ों की संभावित गड़बड़ी के बावजूद 14 दिन तक सन्नाटा क्यों..?
क्या यहां प्रभावशाली नामों का दबाव है या फिर यहां दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं..?
फोन पर “मैनेज” की कोशिश..?
सूत्रों का दावा है कि खबर सामने आने के बाद कुछ अधिकारियों ने केंद्र प्रभारी से संपर्क कर “मामला मैनेज” करने की बात कही। यदि यह सत्य है तो यह न केवल प्रशासनिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप भी माना जाएगा।
जिला प्रशासन की साख दांव पर
यह मामला अब सिर्फ 32,838 क्विंटल धान का नहीं रहा। यह प्रशासन की साख, पारदर्शिता और किसानों के विश्वास का प्रश्न बन गया है। कलेक्टर के आदेश के बाद भी एफआईआर दर्ज न होना यह संकेत देता है कि या तो आदेशों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा, या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था में संरक्षण की परत मौजूद है। कुल-मिलाकर अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी.? या यह मामला भी समय की धूल में दब जाएगा..?



