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BREAKING : रिजर्वेशन का फायदा लेने के लिए धर्म परिवर्तन धोखाधड़ी, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Aaj 24
By Aaj 24

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के मूल भावना के खिलाफ है। सर्वोच्च अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें एक ईसाई महिला को शिड्यूल कास्ट (एससी) सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया गया था। यह महिला पुडुचेरी में अपर डिविजन क्लर्क (UDC) की नौकरी के लिए एससी सर्टिफिकेट चाहती थी। इसके लिए उसने खुद को हिंदू बताया था।

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जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि महिला ईसाई धर्म का पालन करती है और नियमित रूप से चर्च जाती है। इसके बावजूद, वह नौकरी के लिए खुद को हिंदू और शिड्यूल कास्ट का बता रही है। ऐसा दोहरा दावा ठीक नहीं है। बेंच ने कहा कि जो व्यक्ति ईसाई है, लेकिन आरक्षण के लिए खुद को हिंदू बताता है, उसे SC दर्जा देना आरक्षण के उद्देश्य के खिलाफ है। यह संविधान के साथ धोखा है।

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कोर्ट ने कहा कि यह मामला उस बड़े सवाल से जुड़ा है जिसमें SC/ST आरक्षण में धर्म को आधार बनाने की संवैधानिकता पर सुनवाई चल रही है। इसमें ईसाई और मुस्लिम दलितों के लिए आरक्षण की मांग की गई है। 1950 के राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार, सिर्फ हिंदुओं को ही SC का दर्जा मिल सकता है। आरक्षण के लिए सिख और बौद्धों को भी हिंदू माना जाता है। 2007 में, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग ने दलित ईसाइयों और मुसलमानों को SC आरक्षण देने की सिफारिश की थी।

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जस्टिस महादेवन ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। आर्टिकल 25 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने का अधिकार है। कोई व्यक्ति दूसरे धर्म में तब जाता है जब वह उसके सिद्धांतों और विचारों से प्रभावित होता है। लेकिन अगर धर्म परिवर्तन का मकसद सिर्फ आरक्षण का लाभ लेना है, तो इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। ऐसे लोगों को आरक्षण देना, आरक्षण की नीति के सामाजिक उद्देश्य को विफल करेगा।

याचिकाकर्ता सी. सेल्वरानी ने मद्रास हाई कोर्ट के 24 जनवरी, 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। सेल्वरानी का कहना था कि वह हिंदू धर्म मानती है और वल्लुवन जाति से है, जो 1964 के संविधान (पुडुचेरी) अनुसूचित जाति आदेश के तहत आती है। इसलिए, वह आदि द्रविड़ कोटे के तहत आरक्षण की हकदार है। सेल्वरानी ने दलील दी कि जन्म से ही वह हिंदू धर्म मानती है और मंदिरों में जाती है, हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करती है।

महिला ने कोर्ट में कई दस्तावेजों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि वह एक हिंदू पिता और ईसाई मां से पैदा हुई थी। शादी के बाद उसकी मां ने भी हिंदू धर्म अपना लिया था। उसके दादा-दादी और परदादा-परदादी वल्लुवन जाति के थे। उसने यह भी दावा किया कि अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में, उसे SC समुदाय का माना गया। उसके ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी उसकी जाति की पुष्टि करते हैं। उसके पिता और भाई के पास एससी सर्टिफिकेट हैं।

हालांकि, बेंच ने मामले के तथ्यों का अध्ययन करने के बाद कहा कि ग्राम प्रशासनिक अधिकारी की रिपोर्ट और दस्तावेजी सबूतों से साफ है कि उसके पिता एससी समुदाय से थे और मां ईसाई थीं। उनकी शादी ईसाई रीति-रिवाजों से हुई थी। इसके बाद, सेल्वरानी के पिता ने बपतिस्मा लेकर ईसाई धर्म अपना लिया। उसके भाई का बपतिस्मा 7 मई, 1989 को हुआ। सेल्वरानी का जन्म 22 नवंबर, 1990 को हुआ और उसका बपतिस्मा 6 जनवरी, 1991 को विलियनूर, पुडुचेरी के लूर्डेस श्राइन में हुआ। इसलिए, यह स्पष्ट है कि सेल्वरानी जन्म से ईसाई थी और वह एससी सर्टिफिकेट के लिए हकदार नहीं है।

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