दीपावली पर बाजारों में रौनक, लेकिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के घरों में मायूसी; उधार देने से भी कतरा रहे दुकानदार, परिवार का खर्च चलाना हुआ मुश्किल
जशपुर। दीपावली का त्योहार यानी खुशियां, रोशनी, मिठाइयां और अपनों के चेहरों पर मुस्कान। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ की हजारों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं के लिए दीपावली खुशियों का नहीं, बल्कि आर्थिक बेबसी और चिंता का संदेश लेकर आई है। विडंबना देखिए, जो आंगनबाड़ी दीदियां प्रदेश के नौनिहालों के पोषण, महिलाओं और माताओं की देखभाल तथा सरकारी योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने में अपनी जिम्मेदारियां निभाती हैं, उन्हीं के अपने घरों में दो महीने से मानदेय नहीं पहुंचने के कारण त्योहार की रौनक गायब है।
दो माह से मानदेय लंबित होने के चलते प्रदेश की एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं के सामने परिवार का खर्च चलाने तक का संकट खड़ा हो गया है। दीपावली पर बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदना, घर में मिठाई लाना, जरूरी सामान जुटाना और त्योहार की छोटी-छोटी खुशियां मनाना भी अब उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि दुकानदारों से उधार मांगने पर भी पहले जैसी सहूलियत नहीं मिल रही है।
छत्तीसगढ़ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका संघ पंजीयन क्रमांक 409 की जशपुर जिलाध्यक्ष श्रीमती दिलासो कुजूर ने इस स्थिति पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिकाएं पूरे साल पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ विभागीय दायित्वों का निर्वहन करती हैं। बच्चों के पोषण से लेकर गर्भवती महिलाओं, माताओं और बच्चों की देखभाल तक अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाती हैं। शासन की योजनाओं को जमीनी स्तर पर सफल बनाने में उनकी अहम भूमिका होती है, लेकिन जब अपने परिवार के लिए त्योहार मनाने की बारी आती है तो उन्हें अपने ही मेहनत के मानदेय के लिए इंतजार करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि दो महीने से मानदेय नहीं मिलने के कारण दीदियों की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय हो गई है। पहले से महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के सामने अब दीपावली मनाने का संकट है। आखिर बिना पैसे के घर में मिठाई कैसे आएगी? बच्चों की दीपावली कैसे सजेगी? घर में दीपक और जरूरी सामान कैसे खरीदे जाएंगे? यह केवल कुछ दिनों की परेशानी नहीं, बल्कि उन परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा गंभीर सवाल है, जिनकी आजीविका इसी मानदेय पर निर्भर है।
प्रांताध्यक्ष कविता यादव ने भी जताई नाराजगी, तत्काल भुगतान की मांग
छत्तीसगढ़ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका संघ पंजीयन क्रमांक 409 की प्रांताध्यक्ष श्रीमती कविता यादव ने भी लंबित मानदेय को लेकर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी दीदियां दूसरों के घरों में पोषण और खुशियों की रोशनी पहुंचाने का काम करती हैं, लेकिन आज उनके अपने घरों में आर्थिक तंगी के कारण दीपावली की खुशियां फीकी पड़ रही हैं।
उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि दो माह से लंबित मानदेय का तत्काल भुगतान किया जाए। साथ ही ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए कि भविष्य में प्रत्येक माह समय पर मानदेय मिल सके और कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं को अपने ही मेहनत के पैसे के लिए बार-बार इंतजार न करना पड़े।
दूसरों के घरों में पोषण की रोशनी, अपने घरों में अंधेरा क्यों?
यह मामला सिर्फ दो महीने के मानदेय भुगतान में देरी का नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की आजीविका, सम्मान और भावनाओं से जुड़ा है, जो सीमित मानदेय के सहारे अपना घर चलाते हैं।
दीपावली पर हर घर रोशन हो, हर बच्चे के चेहरे पर मुस्कान हो, हर परिवार मिठाइयों के साथ त्योहार मनाए, यह कामना तो सभी करते हैं। लेकिन उन आंगनबाड़ी दीदियों के बच्चों का क्या, जिनके घर में त्योहार से पहले जरूरी खर्च जुटाना भी मुश्किल हो गया है?
जो महिलाएं प्रदेश के बच्चों के भविष्य को पोषण देकर संवारने में जुटी हैं, क्या उनके अपने बच्चों को दीपावली की खुशियां पाने का अधिकार नहीं है?
सवाल यह भी है कि जब त्योहार पर भी मेहनत का मानदेय नहीं मिलेगा, तो आखिर आंगनबाड़ी दीदियां अपने परिवार के साथ दीपावली की खुशियां कैसे मनाएंगी?
संघ पंजीयन क्रमांक 409 ने शासन-प्रशासन से अपील की है कि लंबित मानदेय का तत्काल भुगतान कर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं को सम्मानपूर्वक दीपावली मनाने का अवसर दिया जाए। क्योंकि त्योहार की असली रोशनी तभी सार्थक होगी, जब दूसरों के घरों में खुशियां पहुंचाने वाली इन दीदियों के अपने घर भी रोशन होंगे।