सूरजपुर ।
समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर छत्तीसगढ़ में चल रही विचार-विमर्श की प्रक्रिया के बीच आदिवासी समाज की भागीदारी, प्रतिनिधित्व और बैठक की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सूरजपुर से जुड़े एक ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि यूसीसी पर चर्चा के लिए जारी आमंत्रण प्रक्रिया में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया और आमंत्रित सूची में ऐसे समाज प्रमुखों के नाम भी शामिल हैं, जिनका पहले ही निधन हो चुका है।
समान नागरिक संहिता समिति, छत्तीसगढ़ की ओर से राष्ट्रपति के नाम दिए गए ज्ञापन में आदिवासी समाज की पारंपरिक रूढि़यों, सामाजिक व्यवस्थाओं, भूमि एवं उत्तराधिकार से जुड़े सवालों तथा संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखकर यूसीसी के किसी भी प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की मांग की गई है। ज्ञापन में राज्यपाल और मुख्यमंत्री से भी पूरे विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया गया है।
उपलब्ध दस्तावेज में कलेक्टर सूरजपुर के 28 सितंबर 2026 के पत्र का संदर्भ देते हुए 8 अक्टूबर 2026 को अम्बिकापुर के पीजी कॉलेज में आदिवासी समाज प्रमुखों से संबंधित बैठक की जानकारी का उल्लेख है।
आधिकारिक कार्यक्रम में व्यापक प्रतिनिधित्व का उल्लेख-
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आता है। 5 अक्टूबर 2026 को जारी संभागीय कार्यक्रम की सार्वजनिक जानकारी के अनुसार 8 अक्टूबर को अम्बिकापुर के शासकीय पीजी कॉलेज ऑडिटोरियम में होने वाली बैठक में सरगुजा, कोरिया, सूरजपुर, एमसीबी और बलरामपुर-रामानुजगंज के प्रतिनिधियों के शामिल होने की बात कही गई है।
संभागायुक्त की ओर से राजनीतिक दलों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, शिक्षाविदों, प्रतिष्ठित नागरिकों तथा निगम- मंडल और आयोगों के प्रतिनिधियों से भी सुझाव देने का अनुरोध किया गया है।
मृत समाज प्रमुखों के नाम पर सबसे बड़ा सवाल-
ज्ञापन में आमंत्रित सूची से जुड़ी एक गंभीर आपत्ति यह है कि उसमें ऐसे समाज प्रमुखों के नाम शामिल किए गए, जिनका निधन हो चुका है। दस्तावेज के अनुसार बनारसी पण्डो, जिलाध्यक्ष पण्डो समाज सूरजपुर का करीब तीन वर्ष पूर्व निधन हो चुका है। इसी तरह सहदेव राम मुर्मू, जिला उपाध्यक्ष कोड़ाकू समाज प्रतापपुर के करीब पांच वर्ष पूर्व निधन का उल्लेख किया गया है।
छत्तीसगढ़ पण्डो जनजाति समाज कल्याण समिति के प्रदेश सचिव देवचंद राम पण्डो ने इस मुद्दे पर अलग से आपत्ति दर्ज करते हुए सवाल उठाया है कि यदि मृत समाज प्रमुख का नाम बैठक के आमंत्रण में शामिल है तो आमंत्रण सूची तैयार करने की प्रक्रिया कितनी अद्यतन और गंभीर थी। उनके पत्र में यहां तक कहा गया है कि मृत समाज प्रमुख बैठक में उपस्थित नहीं हो सकता, इसलिए इस आधार पर बैठक की गंभीरता और औपचारिकता पर स्पष्टीकरण जरूरी है।
दस्तावेज में इस सवाल को सीधे तौर पर उठाया गया है कि मृत समाज प्रमुखों को बिना जानकारी के बैठक के लिए आमंत्रित किया जाना प्रशासनिक स्तर पर हुई चूक है या बैठक की प्रक्रिया केवल औपचारिकता तक सीमित है?
भूमि और पैतृक संपत्ति को लेकर सबसे बड़ी चिंता-
ज्ञापन में आदिवासी समाज की भूमि को सबसे संवेदनशील विषयों में से एक बताया गया है। ज्ञापनकर्ताओं का कहना है कि आदिवासी समुदायों की जमीन पहले ही कई कारणों से कम हुई है। ऐसे में यदि उत्तराधिकार के नियमों में बदलाव होता है और बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी के नए प्रावधान लागू होते हैं, तो भविष्य में जमीन के स्वामित्व को लेकर नई परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
ज्ञापन में आशंका व्यक्त की गई है कि यदि आदिवासी परिवारों की जमीन उत्तराधिकार के कारण अलग- अलग हिस्सों में बंटती है और किसी हिस्से का स्वामित्व गैर-आदिवासी के पास पहुंचता है, तो यह आदिवासी भूमि संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यूसीसी के वास्तविक प्रस्तावित प्रावधानों के बिना यह कहना संभव नहीं है कि ऐसा परिणाम निश्चित रूप से होगा, फिलहाल यह ज्ञापनकर्ताओं द्वारा व्यक्त की गई संभावित आशंका है। दस्तावेज में इसी कारण कानून बनने से पहले प्रभाव- अध्ययन की मांग की गई है।
मुद्दा केवल यूसीसी का नहीं, प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया का भी-
ज्ञापनकर्ताओं ने सबसे पहले इस बात पर सवाल उठाया है कि जब समान नागरिक संहिता का प्रभाव विवाह, विवाह- विच्छेद, उत्तराधिकार, संपत्ति और पारिवारिक कानून जैसे व्यापक विषयों से जुड़ सकता है। तब इसके संबंध में होने वाली चर्चा में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी कितनी व्यापक है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि कलेक्टर कार्यालय द्वारा जारी आमंत्रण में सूरजपुर जिले के केवल सामाजिक संगठनों के अध्यक्षों को शामिल किया गया, जबकि ऐसी चर्चा में राजनीतिक दलों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, शिक्षाविदों, प्रतिष्ठित नागरिकों, विशिष्ट एवं गणमान्य नागरिकों तथा निगम-मंडल और आयोगों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए था।
दस्तावेज में इसे बैठक की पारदर्शिता और व्यापकता से जोड़ते हुए कहा गया है कि यूसीसी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा केवल कुछ चुनिंदा समाज प्रमुखों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
यदि आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखने की नीति है तो चर्चा का उद्देश्य क्या?-
ज्ञापन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की ओर से आदिवासी समुदायों को यूसीसी से अलग रखने संबंधी सार्वजनिक बयानों का हवाला देते हुए सवाल उठाया गया है। ज्ञापनकर्ताओं का तर्क है कि यदि सरकार की नीति आदिवासी समाज को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की है, तो फिर विभिन्न आदिवासी समुदायों के समाज प्रमुखों को यूसीसी से संबंधित चर्चा के लिए बुलाने की आवश्यकता और उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।
दस्तावेज में इन दोनों बातों को आपस में असंगत बताते हुए कहा गया है कि इससे आदिवासी समाज के बीच कई प्रकार की आशंकाएं जन्म ले रही हैं।
आदिवासी रूढि़- परंपराओं को लेकर संवैधानिक सवाल-
ज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा आदिवासी समुदायों की पारंपरिक रूढि़यों और सामाजिक प्रथाओं से संबंधित है। ज्ञापनकर्ताओं का कहना है कि आदिवासी समाज की सामाजिक व्यवस्था केवल लिखित कानूनों से नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही सामाजिक परंपराओं, रीति- रिवाजों और सामुदायिक व्यवस्थाओं से भी संचालित होती रही है। ऐसे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों पर कोई समान व्यवस्था बनाने से पहले आदिवासी समाज पर उसके संभावित प्रभाव का अध्ययन जरूरी है।
दस्तावेज में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(3)(1) का उल्लेख करते हुए आदिवासी रूढि़-प्रथाओं को विधिक संरक्षण मिलने का तर्क दिया गया है।
विवाह और उत्तराधिकार के मौजूदा कानूनों का भी दिया हवाला-
ज्ञापन में हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए आदिवासी समुदायों की विशिष्ट स्थिति की ओर ध्यान दिलाया गया है। केंद्रीय कानूनों में भी अनुसूचित जनजातियों के संबंध में विशिष्ट प्रावधान मौजूद हैं।
उदाहरण के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम,1955 की धारा 2(2) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) में अनुसूचित जनजातियों के संबंध में विशेष व्यवस्था है। इन प्रावधानों को देखते हुए यूसीसी पर चर्चा करते समय यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि भविष्य की किसी व्यवस्था में अनुसूचित जनजातियों के लिए क्या दायरा और अपवाद होंगे।
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी जताई आशंका-
ज्ञापन में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी आदिवासी समाज की चिंताओं को सामने रखा गया है। ज्ञापनकर्ताओं का कहना है कि यदि भविष्य की किसी समान नागरिक व्यवस्था में लिव-इन संबंधों को लेकर कानूनी अधिकार या मान्यता का प्रावधान आता है, तो आदिवासी समाज में विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकारों से जुड़े नए प्रश्न खड़े हो सकते हैं, दस्तावेज में आशंका व्यक्त की गई है कि ऐसी परिस्थितियों में परिवार से बाहर संबंध, उत्तराधिकार और भूमि स्वामित्व को लेकर विवाद पैदा हो सकते हैं।
ग्रामसभा और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर-
ज्ञापन में कहा गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों का निराकरण कई स्थानों पर सामाजिक संगठनों तथा ग्रामसभा के स्तर पर होता रहा है, इसलिए किसी एक समान नागरिक व्यवस्था पर विचार करते समय स्थानीय सामाजिक संस्थाओं की भूमिका और पारंपरिक व्यवस्था का भी अध्ययन किए जाने की मांग की गई है।
कानून लागू करने से पहले प्रभाव का अध्ययन हो-
ज्ञापन में राज्य सरकार से किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उसके प्रभाव का व्यापक अध्ययन कराने की मांग की गई है। इसमें विशेष रूप से चार स्तरों पर अध्ययन की जरूरत बताई गई है—सामाजिक प्रभाव, आर्थिक प्रभाव, पारिवारिक प्रभाव, पारंपरिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव ।
ज्ञापनकर्ताओं का कहना है कि किसी कानून का उद्देश्य चाहे जो हो, लेकिन उससे किसी समुदाय की सामाजिक या पारंपरिक व्यवस्था को अपूरणीय क्षति नहीं होनी चाहिए।
राजनीतिक प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी पर भी सवाल-
ज्ञापन में विभिन्न राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों और नेतृत्वकर्ताओं को बैठक में आमंत्रित नहीं किए जाने पर भी आपत्ति दर्ज की गई है। ज्ञापनकर्ताओं के अनुसार यूसीसी कोई सामान्य प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि ऐसा विषय है जिसका प्रभाव नागरिकों के व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों से जुड़ सकता है, इसलिए चर्चा में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
हालांकि,वर्तमान संभागीय स्तर की सार्वजनिक सूचना में राजनीतिक दलों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, शिक्षाविदों तथा विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को सुझाव देने के लिए आमंत्रित किए जाने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है।
यूसीसी पर राज्य में चल रही है परामर्श प्रक्रिया-
यूसीसी को लेकर छत्तीसगढ़ में पहले भी अलग- अलग संभागों में विचार- विमर्श की बैठकें आयोजित की गई हैं। अगस्त-सितंबर 2026 में दुर्ग और राजनांदगांव क्षेत्र में भी यूसीसी के प्रावधानों और प्रभावों पर समूह चर्चा एवं परिचयात्मक बैठकें आयोजित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।अब सरगुजा संभाग के लिए 8 अक्टूबर को अम्बिकापुर में बैठक रखी गई है। सार्वजनिक कार्यक्रम के अनुसार इसमें सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया, एमसीबी और बलरामपुर- रामानुजगंज के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग-
ज्ञापन के अंत में राष्ट्रपति, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री से पूरे विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया गया है।ज्ञापनकर्ताओं की मांग है कि आदिवासी समाज की पारंपरिक रूढि़-प्रथाओं, सामाजिक संस्थाओं, भूमि व्यवस्था और संवैधानिक संरक्षण को ध्यान में रखे बिना किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाए।
इसी क्रम में पारंपरिक आदिवासी महासभा भारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयनाथ केराम ने भी कहा है कि किसी कानून को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उससे किसी समुदाय की सामाजिक, आर्थिक या पारंपरिक व्यवस्था को अपूरणीय क्षति न हो।
अब असली सवालः चर्चा कितनी व्यापक और कितनी पारदर्शी?-
यूसीसी पर आदिवासी समाज की आपत्ति का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि समान नागरिक संहिता लागू होगी या नहीं। इससे आगे सवाल यह है कि यदि ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है तो आदिवासी समाज की विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक व्यवस्थाओं का उसमें स्थान क्या होगा? क्या अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग अपवाद या विशेष व्यवस्था होगी? क्या ग्रामसभा और पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं की भूमिका पर विचार होगा? क्या आदिवासी भूमि और उत्तराधिकार के संभावित प्रभावों का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाएगा? क्या अलग-अलग जनजातीय समुदायों की अलग-अलग प्रथाओं को एक ही व्यवस्था में शामिल किया जा सकेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यूसीसी का प्रारूप तैयार होने से पहले पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श होगा? ये सवाल अब सूरजपुर से उठे ज्ञापन के जरिए व्यापक बहस का हिस्सा बन गए हैं।
फिलहाल 8 अक्टूबर की अम्बिकापुर बैठक इस बहस के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव होगी। सरकार की ओर से इसे सुझाव और विचार प्राप्त करने की प्रक्रिया बताया गया है, जबकि आदिवासी संगठनों की ओर से यह मांग उठाई गई है कि चर्चा केवल औपचारिकता न रहकर वास्तविक और व्यापक जनसंवाद बने।