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केतका सर्किल के जंगलों में साल के पेड़ों की कटाई से उठे सवाल, सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल,

Priyanshu Ranjan

कटे पेड़ों के साथ जंगल में मिले लकड़ी के पटरेनुमा टुकड़े, वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल

सूरजपुर। सूरजपुर वन मंडल के वन परिक्षेत्र सूरजपुर अंतर्गत केतका सर्किल के जंगलों में साल के हरे-भरे और पुराने पेड़ों की कथित कटाई का मामला सामने आने के बाद वन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जंगल से सामने आई तस्वीरों में साल के बड़े पेड़ों के तनों पर कटाई के निशान दिखाई दे रहे हैं। वहीं आसपास लकड़ी के बड़े और पटरेनुमा टुकड़े भी नजर आ रहे हैं।

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सोशल मीडिया पर तस्वीरें सामने आने के बाद मामले की चर्चा तेज हो गई है। तस्वीरों को देखकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या जंगल में पेड़ काटने के बाद लकड़ी को मौके पर ही चीरकर उपयोगी आकार में तैयार किया गया?

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हालांकि, केवल तस्वीरों के आधार पर अवैध कटाई अथवा किसी व्यक्ति या वनकर्मी की संलिप्तता को प्रमाणित नहीं माना जा सकता। मामले की वास्तविक स्थिति वन विभाग द्वारा मौके पर निरीक्षण और विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। यदि जांच में तस्वीरों में दिखाई दे रही स्थिति अवैध कटाई से जुड़ी पाई जाती है, तो यह वन सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था के लिए गंभीर विषय हो सकता है।

जंगल में कटे पेड़ और लकड़ी के टुकड़े

केतका सर्किल के जंगल से सामने आई तस्वीरों में एक बड़े साल के पेड़ के तने पर कटाई के निशान दिखाई दे रहे हैं। आसपास लकड़ी के टुकड़े और पटरेनुमा सामग्री भी नजर आ रही है।

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यही स्थिति कई सवाल खड़े करती है। यदि पेड़ काटे गए हैं तो क्या लकड़ी को जंगल से बाहर ले जाने के बजाय मौके पर ही चीरने की कोशिश की गई? यदि ऐसा हुआ तो वहां लकड़ी चीरने के लिए किस तरह के औजार या उपकरण इस्तेमाल किए गए? तैयार लकड़ी को जंगल से बाहर किस रास्ते और किस माध्यम से ले जाया गया?

इन सवालों का जवाब मौके की जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

पेड़ काटने के साथ लकड़ी को तैयार करने का भी दावा

स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों और सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि क्षेत्र में कथित रूप से लंबे समय से साल की लकड़ी की कटाई और उसके परिवहन की गतिविधियां चल रही हैं। आरोप यह भी है कि पेड़ों को काटने के बाद लकड़ी को जंगल में ही चीरकर सिल्ली, कंडी या चौखट जैसे उपयोगी आकार में तैयार किया जाता है और फिर अलग-अलग रास्तों से बाहर ले जाया जाता है।

इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। ऐसे में वन विभाग की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि जंगल के भीतर लकड़ी की चिराई के प्रमाण मिलते हैं तो जांच में यह भी पता लगाना होगा कि वहां कौन से उपकरण इस्तेमाल किए गए, लकड़ी कितनी मात्रा में तैयार की गई और यह गतिविधि कितने समय से चल रही थी।

वन विभाग की गश्त और निगरानी पर सवाल

जंगलों की सुरक्षा के लिए वन विभाग द्वारा गश्त और निगरानी की व्यवस्था की जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि बड़े और पुराने साल के पेड़ हाल में काटे गए हैं तो वन अमले को इसकी जानकारी कब हुई?

यदि कटाई के निशान और लकड़ी के अवशेष मौके पर मौजूद हैं, तो नियमित गश्त के दौरान इसकी जानकारी विभाग तक क्यों नहीं पहुंची? वहीं यदि स्थानीय दावों के अनुसार ऐसी गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं, तो नियमित निगरानी के दौरान इनकी भनक क्यों नहीं लगी?

ये सवाल किसी कर्मचारी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि वन सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

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कर्मचारियों की भूमिका की जांच भी जरूरी

स्थानीय स्तर पर कुछ वन कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि, केवल आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी की मिलीभगत या लापरवाही का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

यदि विभाग इस मामले की जांच करता है तो संबंधित क्षेत्र में तैनात कर्मचारियों की ड्यूटी, गश्त रजिस्टर, बीट निरीक्षण रिकॉर्ड, पूर्व में मिली शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई की भी समीक्षा की जा सकती है।

इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि मामला केवल कथित अवैध कटाई तक सीमित है या निगरानी व्यवस्था में भी किसी स्तर पर कमी रही।

कितने पेड़ कटे और कितनी लकड़ी निकली?

मामले की वास्तविक गंभीरता का पता वन विभाग के मौके पर भौतिक सत्यापन के बाद ही चल सकेगा। जांच में प्रमुख रूप से यह देखा जाना जरूरी होगा कि:

  • कितने साल के पेड़ काटे गए हैं?
  • कटे पेड़ों की अनुमानित संख्या कितनी है?
  • पेड़ों की उम्र और आकार कितना था?
  • मौके पर कितनी लकड़ी बरामद या मौजूद है?
  • कितने लकड़ी के टुकड़े या सिल्ली तैयार की गई हैं?
  • कटाई के निशान कितने पुराने हैं?
  • पेड़ काटने में किन औजारों का इस्तेमाल किया गया?
  • क्या आसपास अन्य कटे पेड़ों के ठूंठ भी मौजूद हैं?
  • क्या क्षेत्र में पहले भी वन अपराध की शिकायतें मिली हैं?

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही कथित अवैध कटाई के वास्तविक दायरे का आकलन किया जा सकेगा।

साल के पेड़ों की कटाई सिर्फ लकड़ी का नुकसान नहीं

साल का पेड़ छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण वन संपदा में शामिल है। बड़े और पुराने पेड़ों की अनधिकृत कटाई का असर केवल लकड़ी के नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे वन क्षेत्र की संरचना और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ सकता है।

इसलिए जंगल में पेड़ कटने की तस्वीरें या सूचना सामने आने के बाद विभाग के लिए मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सामने लाना महत्वपूर्ण है। यदि वन अपराध की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

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जिले में पहले भी सामने आ चुके हैं अवैध साल लकड़ी के मामले

सूरजपुर जिले में इससे पहले भी अवैध साल लकड़ी के परिवहन और जब्ती से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं। जून 2026 में वन विभाग ने प्रतापपुर क्षेत्र में एक ओमनी वैन से 9 नग अवैध साल चिरान जब्त किए जाने की जानकारी दी थी। विभाग के अनुसार वाहन चालक मौके से फरार हो गया था और मामले में भारतीय वन अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी।

ऐसे में केतका सर्किल के जंगलों से सामने आई तस्वीरों को लेकर भी विभागीय स्तर पर तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

अब तस्वीरों से आगे जांच की जरूरत

केतका सर्किल के जंगलों से सामने आई तस्वीरों ने निश्चित रूप से कई सवाल खड़े किए हैं, लेकिन तस्वीरें अपने आप में पूरे मामले का प्रमाण नहीं हैं। अब महत्वपूर्ण यह है कि वन विभाग इन तस्वीरों और सामने आई सूचना को कितनी गंभीरता से लेता है।

यदि विभाग मौके पर पहुंचकर कटे पेड़ों की संख्या, लकड़ी की मात्रा, कटाई के तरीके और वहां मौजूद अन्य साक्ष्यों का पंचनामा तैयार करता है तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। आवश्यकता पड़ने पर आसपास के जंगल क्षेत्र की व्यापक तलाशी, गश्त रिकॉर्ड की जांच और पूर्व शिकायतों की समीक्षा भी की जा सकती है।

जंगल की रखवाली कागजों में नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए

वन संपदा महज सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज संख्या नहीं है। जंगल में खड़ा प्रत्येक पेड़ पर्यावरण, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों से जुड़ा है।

इसलिए यदि केतका सर्किल में सामने आए कटाई के निशान जांच में अवैध कटाई की पुष्टि करते हैं तो जिम्मेदार लोगों तक पहुंचकर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी होगी। वहीं यदि जांच में आरोप या आशंका गलत पाई जाती है तो विभाग को भी वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जंगल में पेड़ किसने काटे, बल्कि यह भी है कि यदि कटाई हुई तो इसकी जानकारी वन विभाग की निगरानी व्यवस्था तक समय रहते क्यों नहीं पहुंची?

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