सूरजपुर । सरगुजा अंचल में छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी पीएम आवास योजना जहां हजारों गरीब परिवारों के लिए पक्के मकान का सपना लेकर आई, वहीं सूरजपुर जिले के कई गांवों में यही योजना अब अधूरी उम्मीदों का प्रतीक बनती नजर आ रही है। सबसे ज्यादा परेशानी प्रतापपुर ब्लॉक के हितग्राहियों को झेलनी पड़ रही है, जहां बड़ी संख्या में गरीब और विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति के परिवार इस संकट से जूझ रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार योजना के तहत उन्हें मकान स्वीकृत तो हुआ, पहली किस्त भी मिली, लेकिन उसके बाद की राशि महीनों से अटकी हुई है। किसी तरह मजदूरी कर या उधार लेकर उन्होंने अपने घरों की दीवारें खड़ी कर दीं और डीपीसी तक निर्माण कार्य पूरा किया, लेकिन दूसरी किस्त नहीं मिलने से अब निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया है। 
प्रतापपुर ब्लॉक के कई गांवों में यह स्थिति आम हो गई है। अधूरे मकान खुले में खड़े हैं और परिवार असुरक्षित हालात में रहने को मजबूर हैं। कई जगहों पर दीवारें तो खड़ी हैं, लेकिन छत नहीं होने के कारण लोग फिर से पुराने कच्चे घरों या अस्थायी झोपडि़यों में रहने को विवश हैं। हितग्राहियों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनपद और जिला स्तर के अधिकारियों को समस्या से अवगत कराया, लेकिन तीन माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
इस लापरवाही ने गरीब परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यह सामने आता है कि इन परिवारों को मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी भी समय पर नहीं मिल रही है। तीन से चार महीने से मजदूरी भुगतान लंबित है, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कई परिवारों में खाने तक के लाले पड़ गए हैं और लोग कर्ज लेकर जीवनयापन करने को मजबूर हैं। एक हितग्राही ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा,‘सरकार ने हमें मकान का सपना दिखाया, लेकिन अब बीच मझधार में छोड़ दिया। अगर समय पर पैसा नहीं मिलना था, तो हमें इस स्थिति में क्यों डाला गया? ‘
ग्रामीणों का कहना है कि वे शासन की मंशा पर सवाल नहीं उठा रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकारियों और कर्मचारियों की उदासीनता ने पूरी योजना की गति को प्रभावित कर दिया है। विशेष रूप से प्रतापपुर ब्लॉक में यह समस्या व्यापक रूप से देखने को मिल रही है, जहां अधिकांश हितग्राही परेशान हैं और समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आने वाले दिनों में मानसून का खतरा भी सामने है। यदि समय रहते निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ, तो अधूरे मकान और भी ज्यादा क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, जिससे गरीब परिवारों की स्थिति और खराब हो जाएगी।
अब प्रभावित हितग्राहियों ने जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि जल्द से जल्द दूसरी किस्त जारी की जाए और मनरेगा मजदूरी का भुगतान किया जाए, ताकि वे अपने अधूरे घरों को पूरा कर सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।
यह मामला केवल एक योजना की धीमी गति का नहीं, बल्कि उन गरीब और आदिवासी परिवारों की उम्मीदों का है, जो सरकारी योजनाओं के सहारे अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर स्थिति को कितनी प्राथमिकता देता है और कब तक इन अधूरे सपनों को पूरा आशियाना मिल पाता है।