सूरजपुर । जिले के धान खरीदी केंद्रों में सामने आया शॉर्टेज प्रकरण अब सिर्फ अनियमितता का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और व्यवस्था की विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा बन गया है। पहले भौतिक सत्यापन में हजारों बोरी धान कम मिला, संयुक्त जांच टीम ने गंभीर कमी दर्ज की, करोड़ों रुपये के संभावित नुकसान का अनुमान लगाया गया और फिर अचानक दूसरे सत्यापन में सब कुछ “बराबर” हो गया। अब सवाल यह है कि आखिर यह पूरा गणित कैसे बदला? क्या सचमुच स्टॉक की भरपाई हुई, या फिर रिकॉर्ड का संतुलन बैठाया गया?
बता दे की जिले के धान खरीदी केंद्रों में सामने आए भारी शॉर्टेज के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। संयुक्त जांच टीम की रिपोर्ट में 8 उपार्जन केंद्रों में लगभग 37 हजार क्विंटल से अधिक धान की कमी पाई गई है, जिसकी अनुमानित कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी अनियमितता के बावजूद अब तक केवल दो समितियों पर ही सीमित कार्रवाई हुई है, जबकि बाकी मामलों में ठोस कदम नजर नहीं आ रहे।
जांच में उजागर हुआ भारी शॉर्टेज
संयुक्त जांच में जिले के कई उपार्जन केंद्रों में हजारों बोरी धान की कमी दर्ज की गई, अनुमानित तौर पर 37 हजार क्विंटल से अधिक धान का शॉर्टेज सामने आया। यह कोई छोटी-मोटी त्रुटि नहीं थी, बल्कि करोड़ों रुपये के संभावित नुकसान का संकेत था। इसके अलावा कुछ अन्य केंद्रों जैसे रामानुजनगर विकासखंड के छिंदिया उपार्जन केंद्र में भी हजारों बोरी धान की कमी का उल्लेख बताया गया । ऐसे में उम्मीद थी कि कठोर कार्रवाई होगी और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाएगी।
कुल मिलाकर 37,000 क्विंटल से अधिक धान की कमी दर्ज की गई।
इसके अलावा रामानुजनगर विकासखंड के छिंदिया उपार्जन केंद्र में भी लगभग 3,000 बोरी धान कम पाए जाने का उल्लेख ज्ञापन और जांच रजिस्टर में दर्ज बताया जा रहा है, लेकिन वहां भी अब तक स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है।
कार्रवाई या लीपापोती?-
सूत्रों के अनुसार उमेश्वरपुर में जिम्मेदारों पर एफआईआर दर्ज की गई है, सावरावा में एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी हुआ, लेकिन अब तक अपराध पंजीबद्ध नहीं हुआ। अन्य केंद्रों में प्रभारियों को निलंबित किया गया, लेकिन वे कथित रूप से अब भी समितियों में सक्रिय हैं और धान उठाव व खरीदी कार्य में भूमिका निभा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब निलंबन हुआ है तो संबंधित प्रभारी उसी समिति में किस हैसियत से कार्य कर रहे हैं?
कलेक्टर के संदेश पर भी सवाल-

सूत्रों का दावा है कि निरीक्षण के दौरान यह संदेश दिया गया कि “धान की खरीदी और उठाव जीरो होना चाहिए, अब प्रश्न यह उठता है, क्या यह “जीरो करने” का निर्देश कमी को कागजों में शून्य करने की ओर संकेत था? क्या शॉर्टेज की भरपाई का समय देकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है? या फिर राजनीतिक संरक्षण के चलते कार्रवाई सीमित रखी गई?
करोड़ों का नुकसान, जिम्मेदारी किसकी?-
इतनी बड़ी मात्रा में धान की कमी से सीधे तौर पर सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का संभावित नुकसान है। यदि संयुक्त जांच टीम की रिपोर्ट सही है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित गड़बड़ी की ओर इशारा करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि—क्या सभी दोषियों पर समान कार्रवाई होगी? क्या उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच की मांग की जाएगी? या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
कार्रवाई की शुरुआत, फिर ठहराव-
प्रारंभिक चरण में कुछ समितियों के प्रभारियों को निलंबित किया गया, एक-दो स्थानों पर एफआईआर दर्ज हुई या दर्ज करने के आदेश दिए गए, लेकिन धीरे-धीरे कार्रवाई का दायरा सिमटता नजर आया।
जहां 8 से 10 समितियों में शॉर्टेज की चर्चा थी, वहां वास्तविक कानूनी कार्रवाई सीमित रह गई। स्थानीय स्तर पर आरोप यह भी है कि निलंबित प्रभारी अब भी उसी समिति में सक्रिय दिखे, धान उठाव और रिकॉर्ड प्रक्रिया में उनकी भूमिका बनी रही। यदि यह सच है, तो यह नियमों और प्रशासनिक मर्यादा दोनों पर प्रश्नचिह्न है।
दोबारा भौतिक सत्यापन: आवश्यकता या अवसर?-
सबसे बड़ा विवाद दूसरे भौतिक सत्यापन को लेकर है।
पहले सत्यापन में कमी दर्ज हुई, मीडिया में खबरें आईं, जनता में चर्चा तेज हुई, और फिर हुआ दोबारा सत्यापन। परिणाम—कई जगह स्टॉक बराबर। अब यहां से शुरू होता है असली सवालों का दौर, क्या पहली जांच में तकनीकी त्रुटि थी? यदि थी, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं? यदि पहली रिपोर्ट सही थी, तो अचानक कमी कैसे खत्म हो गई? क्या भरपाई कराई गई? यदि हां, तो वह धान आया कहां से? दूसरा सत्यापन यदि पारदर्शी प्रक्रिया का हिस्सा था, तो उसकी विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
“जीरो” का संदेश: प्रशासनिक लक्ष्य या संकेत?-
निरीक्षण के दौरान कथित तौर पर यह संदेश दिया गया कि धान की खरीदी और उठाव जीरो होना चाहिए, यह वाक्य अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है, क्या इसका अर्थ था—शॉर्टेज खत्म कर संतुलन बनाओ? या रिकॉर्ड में कमी शून्य दिखाओ? प्रशासन की ओर से यदि इसका स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं आता, तो यह कथन संदेह को और गहरा करता है।
परिवहन, गोदाम और समिति—कड़ी दर कड़ी- धान खरीदी की पूरी प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है, किसान से खरीदी, समिति में भंडारण, परिवहन के माध्यम से गोदाम तक पहुंचाना, रिकॉर्ड मिलान। यदि इतनी बड़ी मात्रा में शॉर्टेज पाया गया, तो जिम्मेदारी सिर्फ समिति प्रभारी तक सीमित नहीं हो सकती। क्या परिवहन में हेराफेरी हुई? क्या गोदाम स्तर पर स्टॉक एंट्री में अंतर था? क्या निगरानी तंत्र ने समय पर संकेत नहीं पकड़ा? यह जांच ऊपर से नीचे तक होनी चाहिए थी।
प्रशासनिक जवाबदेही: शीर्ष से जमीनी स्तर तक-
किसी भी जिले में धान खरीदी राज्य सरकार की प्राथमिक योजनाओं में से एक होती है। इसकी निगरानी जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी—कलेक्टर—के अधीन होती है, यदि इतने बड़े पैमाने पर शॉर्टेज हुआ, तो यह केवल जमीनी कर्मचारियों की गलती नहीं हो सकती, हालांकि बिना ठोस प्रमाण किसी अधिकारी की भूमिका पर सीधा आरोप लगाना उचित नहीं, लेकिन यह भी जरूरी है कि, कलेक्टर कार्यालय विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करे, दोनों भौतिक सत्यापन की तुलना सामने लाए, स्पष्ट करे कि किस आधार पर मामला संतुलित माना गया। यदि शीर्ष स्तर से स्पष्टता आएगी, तो नीचे के स्तर पर उठ रहे सवाल भी शांत होंगे।
मीडिया और जनदबाव की भूमिका-
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। खबरें सामने आईं, आंकड़े सार्वजनिक हुए, और जनचर्चा तेज हुई, प्रश्न यह है कि यदि समाचार प्रकाशित न होते, तो क्या दूसरा सत्यापन होता?
और यदि मीडिया के बाद सत्यापन हुआ, तो क्या यह दबाव का परिणाम था? पारदर्शी शासन में मीडिया और प्रशासन का रिश्ता टकराव का नहीं, जवाबदेही का होना चाहिए।
सरकारी खजाने और किसानों का भरोसा-
धान खरीदी सिर्फ आर्थिक लेन-देन नहीं है। यह किसानों के विश्वास और राज्य की साख का प्रश्न है। यदि कमी वास्तविक थी, तो यह सीधे सरकारी खजाने को नुकसान और किसानों के अधिकारों पर चोट है। यदि कमी बाद में “समायोजित” हुई, तो यह पारदर्शिता पर प्रश्न है। दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।
क्या होनी चाहिए आगे की कार्रवाई?
दोनों भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
स्वतंत्र ऑडिट या उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
परिवहन और गोदाम स्तर पर भी जवाबदेही तय हो।
निलंबित अधिकारियों को समिति से पूर्णतः पृथक रखा जाए।
दोष सिद्ध होने पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो।
धान से बड़ा सवाल – व्यवस्था की विश्वसनीयता-
सूरजपुर का यह प्रकरण केवल धान की बोरी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का मामला है, पहले कमी, फिर बराबरी, पहले सख्ती, फिर शांति, पहले शॉर्टेज, फिर “जीरो”, इन तीन चरणों के बीच जो अंतर है, वही असली कहानी है। यदि प्रशासन निष्पक्ष है, तो उसे तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए। यदि गड़बड़ी हुई है, तो दोषियों पर समान कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वह नीचे के स्तर पर हों या ऊपर के। क्योंकि अंततः सवाल धान का नहीं, जनता के भरोसे का है और भरोसा एक बार कम हो जाए, तो उसे दोबारा “जीरो” से भरना आसान नहीं होता।



