भर्राशाही का नमूना : शिक्षा विभाग ने निपट चुका केस “लंबित” बताकर प्रमोशन आदेश जारी किया

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हाई कोर्ट के साफ़ फ़ैसले के बाद भी शासन ने झूठ बोलकर प्रमोशन रोके, अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा

स्कूल शिक्षा विभाग, छग शासन की भर्राशाही का मजेदार नमूना सामने आया है।

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इस साल 30 अप्रैल को जारी ट्राईबल संवर्ग के प्रिंसिपल पदोन्नति आदेश में कहा गया है कि सभी प्रमोशन हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका 91/2019 के अंतिम निर्णय के अध्यधीन होंगे।

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सुप्रीम कोर्ट के याचिकाकर्ता पी. गिलक राव ने जन-सूचना जारी कर के बताया है कि पदोन्नति-आरक्षण संबंधी उस प्रकरण को हाई कोर्ट अप्रैल 2024 में ही निपटा चुका है।

दरअसल इस याचिकाकर्ता जैसे कई प्रधान पाठक माध्यमिक शाला ने जो कि 2013-14 से उस पद पर कार्यरत हैं स्कूल शिक्षा सेवा नियम 2019 को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

इनकी शिकायत रही है कि 2019 के सेवा नियमों में कई विभागों के अंधाधुंध मिष्रण के कारण उनके कई जूनियर बिना मेरिट के उनसे पहले प्रिंसिपल बन रहे हैं। ये जुनियर जो यूडीटी से उनके साथ 2013-14 में प्रधान पाठक पद पर पदोन्नति नहीं पा सके थे लेकिन 2017 के बाद समकक्ष पद लेक्चरर/व्याख्याता पर पदोन्नत हो गए थे।

नौकरशाहों ने अपनी सनक में पांच सेवाओं को मिलाते समय हितबद्ध समूहों के साथ चर्चा करने से इनकार कर दिया था। मेरिट को बढावा देने के लिए की जाने वाली प्रिंसिपल सीधी भर्ती का कोटा घटा कर 25% से 10% कर दिया गया है।

हाई कोर्ट ने 2019 के नियमों में पदोन्नति कोटे के प्रधान पाथक और व्याख्याता पदों के बीच वितरण प्रतिशत बदलाव को अपने 1 जुलाई 2025 फ़ैसले में पॉलिसी मैटर ठहराते हुए अपास्त करने से मना कर दिया।

इसी फ़ैसले के खिलाफ़ एस एल पी डायरी 46877/2025 फ़ाइल की गई है जिसमें स्कूल शिक्षा विभाग की भर्राशाही रेखांकित करने के लिए निपट चुके मामले को लंबित बताने के शासन के सफ़ेद झूठ का पर्दाफ़ाश किया गया है।

इन याचिकाकर्ताओं के केस से बिल्कुल अलग मामला है कि छग शासन के पदोन्नति नियम 2003 की आरक्षण प्रतिशत संबंधी कंडिका 5 को हाइ कोर्ट ने फ़रवरी 2019 में अपास्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाए शासन ने जरा सी रद्दोबदल के साथ वही कंडिका 5 अक्टूबर 2019 में अधिसूचित कर दी जिसे हाई कोर्ट को अप्रैल 2024 में फिर से अपास्त करना पडा।

शासन को तीन महीने में नए पदोन्नति-आरक्षण के नए नियम ब्नाने की छूट दी गई थी लेकिन न तो शासन ने इसके नए नियम बनाए और न ही हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

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