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प्रतीक्षा बस स्टैंड जमीन विवाद में बड़ा प्रशासनिक एक्शन, कलेक्टर ने दिए एफआईआर के निर्देश

Priyanshu Ranjan

खसरा नंबर 3714 के कथित फर्जी दस्तावेजों से अंतरण का मामला; जांच में राजस्व रिकॉर्ड, मृत्यु प्रमाण पत्र और वारिसान संबंधी दस्तावेजों में सामने आईं गंभीर विसंगतियां

अंबिकापुर। प्रतीक्षा बस स्टैंड अंबिकापुर क्षेत्र की बेशकीमती जमीन से जुड़े विवाद ने अब गंभीर मोड़ ले लिया है। खसरा क्रमांक 3714 की भूमि के कथित फर्जी एवं दोषपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर अंतरण के मामले में कलेक्टर सरगुजा ने तहसीलदार अंबिकापुर को संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर भूमि को विधिवत शासन में निहित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

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कलेक्टर कार्यालय से जारी 23 सितंबर 2026 के आदेश में यह कार्रवाई अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अंबिकापुर की जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई है। जांच रिपोर्ट में भूमि के पुराने राजस्व अभिलेखों, वारिसान की जानकारी, मृत्यु प्रमाण पत्र और फौती नामांतरण की प्रक्रिया को लेकर कई विसंगतियों का उल्लेख किया गया है।

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तालाब की जमीन पाटकर प्लाटिंग की शिकायत से शुरू हुआ मामला

मामले की शुरुआत प्रतीक्षा बस स्टैंड क्षेत्र की भूमि को लेकर की गई शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि खसरा क्रमांक 3714 की भूमि पर मौजूद जल क्षेत्र को पाटकर प्लाटिंग की जा रही है।

शिकायत में यह भी कहा गया था कि संबंधित क्षेत्र का उपयोग तालाब के रूप में होता रहा है और आसपास के लोग निस्तारी, नहाने, पशुओं को पानी पिलाने सहित अन्य आवश्यकताओं के लिए इसका इस्तेमाल करते रहे हैं।

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कलेक्टर कार्यालय के आदेश में यह भी दर्ज है कि नगर निगम अंबिकापुर के मास्टर प्लान 2021 में संबंधित भूमि को नगर निगम के तालाबों की सूची में शामिल किए जाने तथा तालाब के रूप में उपयोग किए जाने संबंधी तथ्य शिकायत में प्रस्तुत किए गए थे।

इसके बाद एसडीएम अंबिकापुर से मामले की जांच कराई गई।

1954-55 के राजस्व रिकॉर्ड से जुड़ा अहम सवाल

जांच रिपोर्ट के अनुसार संबंधित भूमि वर्ष 1954-55 के पूर्व से जैलाल पिता बोधन, जाति गोंड के नाम दर्ज थी। आदेश में भूमि को अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के रूप में भी संदर्भित किया गया है।

इसके बाद की राजस्व प्रक्रिया में एक अलग व्यक्ति जैलाल पिता देवराम के वारिसों की जानकारी तैयार किए जाने और उसका उपयोग जैलाल पिता बोधन के वारिसों के संबंध में किए जाने का उल्लेख जांच रिपोर्ट में किया गया है।

यही विसंगति अब पूरे मामले की जांच का प्रमुख बिंदु बन गई है।

एक जैलाल की जगह दूसरे जैलाल के वारिसों का इस्तेमाल?

जांच रिपोर्ट में उल्लेख है कि अमलभिट्ठी के पटवारी द्वारा जैलाल पिता देवराम के वारिसों की जानकारी तैयार की गई थी। आरोप है कि इसी जानकारी का इस्तेमाल जैलाल पिता बोधन के वारिसों के संबंध में करते हुए राजस्व अभिलेखों में फौती नामांतरण की कार्रवाई की गई।

इस बिंदु पर अब यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि दोनों अलग-अलग नामों और पिता के नाम के बावजूद वारिसों की जानकारी का इस्तेमाल किस आधार पर हुआ, दस्तावेज किसने तैयार किए और राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत की गई।

मृत्यु प्रमाण पत्र पर भी उठे सवाल

जांच के दौरान जैलाल पिता बोधन की 23 अप्रैल 1976 को मृत्यु होने संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है। हालांकि, नगर पालिक निगम अंबिकापुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त मृत्यु प्रमाण पत्र निगम के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था और न ही निगम द्वारा जारी किया गया था।

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नगर निगम की ओर से यह जानकारी 4 मई 2026 को दिए जाने का उल्लेख कलेक्टर के आदेश से संबंधित विवरण में है।

अब पुलिस जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित मृत्यु प्रमाण पत्र कहां से प्राप्त हुआ, उसकी सत्यता किस स्तर पर जांची गई और उसके आधार पर आगे की राजस्व प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी।

कई व्यक्तियों की भूमिका जांच के दायरे में

कलेक्टर के आदेश में एसडीएम की जांच रिपोर्ट के आधार पर चन्द्रशेखर यादव पिता स्व. जगतपाल यादव और आजाद इराकी पिता रियाजुद्दीन इराकी की भूमि अंतरण में भूमिका का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा जांच रिपोर्ट में नोहरसाय, रामकुमार, श्रीलाल, पूर्णिमा, जनकुंवर, चन्द्रभान यादव और मीरा यादव सहित अन्य विक्रेताओं की संलिप्तता प्रतीत होने की बात कही गई है।

ग्राम पंचायत अमलभिट्ठी के तत्कालीन संबंधित सरपंच और सचिव की भूमिका को लेकर भी जांच में सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि, इन सभी व्यक्तियों के विरुद्ध आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अंतरण का उल्लेख

कलेक्टर के आदेश में एसडीएम राजस्व की जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के अंतरण में फर्जी एवं दोषपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर छल-कपट और धोखाधड़ी किए जाने की बात सामने आई है।

इसी आधार पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं।

इस तरह मामला अब केवल राजस्व रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासन ने जांच निष्कर्षों के आधार पर पुलिस कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाया है।

आलोक दुबे की शिकायत के बाद हुई जांच

वरिष्ठ पार्षद आलोक दुबे ने बताया कि उन्होंने 2 सितंबर 2026 को कलेक्टर सरगुजा के समक्ष इस मामले की शिकायत प्रस्तुत की थी। उनके अनुसार शिकायत के साथ पुराने दस्तावेज और राजस्व अभिलेखों से संबंधित तथ्य भी प्रस्तुत किए गए थे।

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आलोक दुबे ने आरोप लगाया कि पुराने सेटलमेंट और अधिकार अभिलेख में भूमि जैलाल गोंड के नाम दर्ज होने के बावजूद बाद की प्रक्रिया में नाम और वारिसों का स्वरूप बदल गया।

उन्होंने भूमि दलालों, तत्कालीन राजस्व अधिकारियों और संबंधित कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से फर्जी वंशावली तैयार कर भूमि का अंतरण कराने का आरोप लगाया है। यह शिकायतकर्ता का आरोप है और इसकी अंतिम पुष्टि पुलिस जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया में ही होगी।

भूमि को शासन में निहित करने की प्रक्रिया के निर्देश

कलेक्टर ने तहसीलदार अंबिकापुर को संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने और उसका पालन प्रतिवेदन अविलंब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

इसके साथ ही जांच प्रतिवेदन और उपलब्ध राजस्व अभिलेखों के आधार पर संबंधित भूमि को विधिवत शासन में निहित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

आदेश की प्रतिलिपि पुलिस अधीक्षक सरगुजा, एसडीएम अंबिकापुर और जिला जनसंपर्क कार्यालय को भी भेजी गई है।

अब पुलिस जांच में सामने आएगी दस्तावेजों की पूरी कड़ी

प्रशासनिक जांच के बाद अब मामले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी पुलिस कार्रवाई होगी। एफआईआर के बाद जांच में मूल अधिकार अभिलेख, वारिसान, मृत्यु प्रमाण पत्र, फौती नामांतरण, बिक्री दस्तावेज और रजिस्ट्री सहित पूरी दस्तावेजी श्रृंखला की जांच की जा सकती है।

मुख्य सवाल यह होंगे कि मूल रिकॉर्ड में भूमि किसके नाम थी, वारिसों की पहचान किस आधार पर हुई, मृत्यु प्रमाण पत्र की पुष्टि कैसे हुई, दूसरे व्यक्ति के वारिसों की जानकारी का इस्तेमाल कैसे हुआ और भूमि अंतरण की पूरी प्रक्रिया किन दस्तावेजों के आधार पर पूरी हुई।

फिलहाल 23 सितंबर 2026 के कलेक्टर आदेश के बाद यह मामला शिकायत और राजस्व जांच के स्तर से आगे बढ़कर एफआईआर और आपराधिक जांच के चरण में पहुंच गया है। अब पुलिस जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि जांच में सामने आए आरोपों में से कौन-कौन से तथ्य उपलब्ध साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं।

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