भरत शर्मा की रिपोर्ट

इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना 2023 को लेकर पूर्व विधायक पारस सकलेचा की ओर से दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि यह एक नीति से जुड़ा मसला है। इसके लागू करने, संशोधित करने या बंद करने का अधिकार राज्य सरकार के पास है न कि हाईकोर्ट के पास। खासकर तब, जब चुनौती PIL के माध्यम से दी गई हो। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि लाड़ली बहना योजना में पंजीयन या आयु सीमा जैसे मुद्दों पर अंतिम फैसला सरकार का ही होगा, जब तक कि कोई ठोस संवैधानिक आधार सामने न आए।
नए पंजीयन बंद करने को दी थी चुनौती
पूर्व विधायक पारस सकलेचा की और से यह जनहित याचिका इंदौर हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि 20 अगस्त 2023 से योजना के तहत नए पंजीयन (ऑनलाइन और ऑफलाइन) बंद कर दिए गए, जो मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उनका कहना था कि योजना का उद्देश्य महिला सशक्तिकरण है और जब यह सतत नीति है, तो पंजीयन बंद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। इस योजना के तहत पहले 23 से 60 वर्ष की विवाहित महिलाओं (विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता सहित) को हर महीने ₹1000 देने का प्रावधान था, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹1250 किया गया। 19 जुलाई 2023 के आदेश से न्यूनतम आयु 23 से घटाकर 21 वर्ष कर दी गई।
कोर्ट ने कहा- यह सरकार का अधिकार क्षेत्र
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी योजना की शुरुआत, समाप्ति या अवधि तय करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यूनतम 21 वर्ष और अधिकतम 60 वर्ष की आयु तय करना भी नीति का हिस्सा है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता याचिकाकर्ता स्वयं योजना का लाभार्थी नहीं है, इसलिए राशि बढ़ाने या पंजीयन खोलने की मांग PIL के माध्यम से नहीं सुनी जा सकती। राज्य की ओर से दलील दी गई कि जब तक कोई वास्तविक लाभार्थी अदालत नहीं आता, तब तक नीति को PIL में चुनौती देना उचित नहीं। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। शासन की ओर से उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव और शासकीय अधिवक्ता प्रद्युम्न किबे ने पैरवी की।



