नई दिल्ली/विशेष। 25 जुलाई को फूलन देवी के शहादत दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। भारतीय राजनीति और सामाजिक इतिहास में फूलन देवी का जीवन आज भी बहस, विमर्श और अध्ययन का विषय बना हुआ है। उन्हें एक ओर बेहमई कांड के कारण विवादित व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक लोग उन्हें जातिगत उत्पीड़न, लैंगिक हिंसा, वर्गीय शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की प्रतीक मानते हैं।
मल्लाह समुदाय में जन्मी फूलन देवी का बचपन गहरे अभाव, सामाजिक भेदभाव और हिंसा के बीच बीता। कम उम्र में विवाह, घरेलू उत्पीड़न, यौन हिंसा और न्याय के लिए लंबे संघर्ष ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। बाद में वे डकैत गिरोह से जुड़ीं और 1981 के चर्चित बेहमई कांड के बाद राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गईं।
करीब 11 वर्ष जेल में रहने के बाद 1994 में उनकी रिहाई हुई। इसके बाद उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति में प्रवेश किया और लोकसभा सदस्य चुनी गईं। 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।
फूलन देवी का जीवन भारतीय समाज में जाति, वर्ग और लैंगिक असमानता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उनकी आत्मकथा “I, Phoolan Devi: The Autobiography of India’s Bandit Queen” उनके संघर्षों और उस दौर के सामाजिक यथार्थ को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है।
शहादत दिवस पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और समर्थकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सामाजिक न्याय, महिला सम्मान और समानता के संघर्ष में उनके योगदान को याद किया।
सिद्धार्थ रामू जी के फेसबुक वॉल से साभार