भरत शर्मा की रिपोर्ट
मध्यप्रदेश /रतलाम में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रशासन का दायित्व नागरिकों की संपत्ति और अधिकारों की रक्षा करना है। परंतु जब निजी भूमि और संपत्तियों को विवादित या शासकीय बताने के प्रयास संदिग्ध दस्तावेज़ों अथवा अपूर्ण प्रतिवेदनों के आधार पर किए जाएँ, तो स्वाभाविक रूप से गंभीर प्रश्न उठते हैं भूमि अभिलेखों में त्रुटियाँ हो सकती हैं, परंतु उनका सुधार विधिसम्मत प्रक्रिया से होना चाहिए। यदि किसी नागरिक की निजी भूमि को शासकीय घोषित करने का प्रयास किया जाता है, तो उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य, पारदर्शी जांच और विधिक परीक्षण अनिवार्य है। अन्यथा यह नागरिक के संपत्ति अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।विशेष चिंता तब उत्पन्न होती है जब माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद मामले को बार-बार अपील में ले जाया जाता है। अपील का अधिकार विधिसम्मत है, परंतु यदि वह केवल विलंब या अनुपालन टालने का माध्यम बन जाए, तो इससे न्याय प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और शासकीय व्यय भी बढ़ता है। सार्वजनिक धन का उपयोग विवेकपूर्ण और उत्तरदायी ढंग से होना चाहिए।
प्रश्न यह भी है कि यदि किसी प्रकरण में बार-बार न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों को त्रुटिपूर्ण पाता है, तो संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही क्यों न तय हो? जब एक सामान्य नागरिक न्यायालय में हारने पर स्वयं खर्च वहन करता है, तो प्रशासनिक स्तर पर गलत या असावधान निर्णयों के कारण होने वाले व्यय की समीक्षा क्यों न हो
जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निम्न कदम विचारणीय हैं
भूमि संबंधी विवादों में स्वतंत्र एवं तकनीकी जांच अनिवार्य की जाए।
न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन की समयबद्ध मॉनिटरिंग हो।
बार-बार निरस्त निर्णयों की स्थिति में विभागीय समीक्षा कर जिम्मेदारी तय की जाए।
अनावश्यक अपीलों पर प्रशासनिक स्वीकृति की उच्च स्तरीय जांच हो।
यदि किसी अधिकारी की लापरवाही से शासकीय धन का अपव्यय सिद्ध हो, तो नियमों के अनुरूप व्यक्तिगत दायित्व निर्धारित किया जाए।
लोकतंत्र में प्रशासनिक अधिकार व्यापक हैं, परंतु वे निरंकुश नहीं हो सकते। अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी अनिवार्य है। नागरिक का विश्वास तभी बना रह सकता है जब प्रशासन पारदर्शिता, विधि-पालन और जवाबदेही का पालन करे।
न्यायालय के आदेशों का सम्मान और नागरिक संपत्ति अधिकारों की रक्षा — यही सुशासन की पहचान है।



