नई दिल्ली, 29 जनवरी 2026 (aaj24.in ब्यूरो):
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। जनवरी 2026 में यह तकनीक अब पूरी तरह डिप्लॉयमेंट-रेडी हो चुकी है, जिससे भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो इस उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स को स्वदेशी रूप से बना सकते हैं। 2016 की राफेल डील में फ्रांस द्वारा GaN तकनीक ट्रांसफर करने से इनकार के बाद शुरू हुआ यह सफर अब भारत की रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता का मजबूत प्रतीक बन चुका है।
DRDO के सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (SSPL, दिल्ली) और गैलियम आर्सेनाइड एनेबलिंग टेक्नोलॉजी सेंटर (GAETEC, हैदराबाद) ने मिलकर GaN मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट्स (MMICs) विकसित किए। मार्च 2023 में ब्रेकथ्रू के बाद, अब जनवरी 2026 तक 30 से अधिक चिप्स विभिन्न फ्रीक्वेंसी बैंड्स पर डिजाइन और टेस्ट हो चुके हैं। ये चिप्स AESA रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स, मिसाइल सीकर्स, UAVs, सैटेलाइट्स और 5G कम्युनिकेशन में इस्तेमाल होंगे।
GaN चिप्स सिलिकॉन-आधारित चिप्स से 300 गुना तेज स्विचिंग करते हैं और 1000 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान पर काम कर सकते हैं। इससे सिस्टम्स छोटे, हल्के, अधिक कुशल और विश्वसनीय बनते हैं। Su-30MKI के विरूपक्ष AESA रडार, LSTAR रडार, RISAT सैटेलाइट्स और AEW&C Mk2 जैसे प्लेटफॉर्म्स में इनका एकीकरण अब संभव है। DRDO ने 4-इंच सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) वेफर्स का स्वदेशी उत्पादन और 150W तक के GaN हाई इलेक्ट्रॉन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर (HEMTs) विकसित कर लिए हैं, जबकि MMICs 40W तक की पावर हैंडल कर सकते हैं।
इस सफलता से भारत अमेरिका, फ्रांस, रूस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और चीन के बाद सातवां देश बन गया है। वैश्विक GaN बाजार 2031 तक 21 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। DRDO इस तकनीक को कम लागत पर भारतीय उद्योग को ट्रांसफर कर रहा है, जो ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को नई गति देगा।
रक्षा वैज्ञानिकों के अनुसार, यह सिर्फ लैब सफलता नहीं है – चिप्स अब इंटीग्रेशन और परिचालन के लिए तैयार हैं। राफेल के ‘सीक्रेट कोड’ को क्रैक करने से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत हुई है, और भविष्य के युद्ध में स्पेक्ट्रम डोमिनेंस हासिल करने में मदद मिलेगी।



