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राजनैतिक व्यंग्य-समागम : एक अच्छा लड़का धरमेन्दर : विष्णु नागर…

Bharat Sharma

धरमेन्दर एक अच्छा लड़का है। इतना अच्छा लड़का है कि उसे भी लगता है कि वह बहुत ही अच्छा लड़का है।उसकी दुआ है कि हर मां-बाप को उस जैसी संतान हो।

वह हर लड़के को देखकर मन ही मन तुलना करता है कि यह मेरे जैसा अच्छा लड़का है या नहीं है और हर बार वह यह जानकर खुश हो जाता है कि उसके जैसा अच्छा लड़का कोई हो ही नहीं सकता। वह सोचता तो यह भी है कि उसके जैसा लड़का ही क्या, लड़की भी शायद ही कोई इस दुनिया में हो, मगर इस बारे में वह निश्चय नहीं कर पाता, क्योंकि लड़कियां उसे बहुत अच्छी लगती हैं। हो सकता है, उनमें उस जैसी कोई पूरी तरह नहीं तो 80 प्रतिशत हो, मगर उस जैसी सौ-फीसदी अच्छी तो कोई हो ही नहीं सकती! वह सुरक्षित है।

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वह हर दिन अपनी मम्मी से पूछता है कि मम्मी मैं एक अच्छा लड़का हूं न! मां कहती हैं, हां मेरे लाल, तेरे जैसा अच्छा लड़का, दुनिया में कोई नहीं। मैं भी नहीं, तेरे पापा भी नहीं, कोई और भी नहीं। भगवान भी नहीं। वह पिता से पूछता है, तो वो भी कहते हैं, हां, मेरे बेटे जैसा कोई नहीं। इससे वह और अधिक खुश हो जाता है। किसी दिन उसके पापा कह देते हैं कि रोज क्या पूछता रहता है बेवकूफ। अपनी रोज तारीफ करवाना अच्छी बात नहीं है।तो वह थोड़ी देर के लिए हताश हो जाता है। वह सोचता है, पापा मुझसे जलते हैं। बस मां है, जो मुझसे जलती नही!

उसकी मम्मी, उसके पापा को अलग ले जाकर कहती है कि बेचारे का दिल क्यों तोड़ते हो, कह दो, अच्छा लड़का है। खुश हो जाएगा बच्चा। तो वह कह देते हैं। एक दिन उन्होंने कहा कि हमसे तो रोज पूछते हो, मगर तुम ये तो कभी नहीं कहते कि पापा, आप बहुत अच्छे हो, मम्मी, तुम बहुत अच्छी हो। वह सोच में पड़ गया। मजबूरी में कह तो दिया कि आप दोनों बहुत अच्छे हो, मगर वह जानता था कि वही सबसे अच्छा है। मां -बाप में वह बात कहां, जो उसमें है!

धरमेन्दर के घर में रोज किसी नरेन्दर की तारीफ़ होती रहती थी। रोज शाम को कोई आ जाता और नरेन्दर की तारीफ शुरू हो जाती। उस दौरान कोई ग़लती से भी धरमेन्दर की तारीफ नहीं करता था‌। धरमेन्दर को इसका बहुत बुरा लगता। उससे अच्छा भी इस दुनिया में कोई हो सकता है? पता चला, यह वही नरेन्दर है, जो रोज अखबार में आता है, टीवी में भेस बदल -बदल कर छाता है। सड़क पर जिसका फोटो टंगा मिलता है।

एक दिन धर्मेन्दर ने अपने पापा से पूछा, पापा, क्या ये नरेन्दर, मुझसे भी अच्छा है? पापा ने मुस्कुराते हुए कहा, जाओ, बेटा खेलो। इसके आगे कुछ नहीं कहा। धरमेन्दर ने सोचा, जरूर नरेन्दर मुझसे अच्छा है। अब नरेन्दर, धरमेन्दर का आदर्श बन गया। उसका लक्ष्य अब नरेन्दर बनना था।

धरमेन्दर को अब जहां भी नरेन्दर की तस्वीर दिख जाती, उसके वह हाथ जोड़ना नहीं भूलता। एक बार साइकिल से जा रहा था, तो उसे नरेन्दर की तस्वीर दिख गई। उसे ध्यान नहीं रहा और दोनों हाथ छोड़कर हाथ जोड़ने के चक्कर में अपने हाथ-पैर तुड़ा बैठा। इससे उसकी नरेन्दर के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई। वह नरेन्दर का नाम जहां सुनता, वहां श्रद्धा से उसका सिर झुक जाता। उसकी आवाज़ सुनता, तो सब काम छोड़कर उसकी वाणी का आनंद लेने लगता। स्कूल में भी नरेन्दर-नरेन्दर का जाप करता। वह नरेन्दर की तरह बोलता। नरेन्दर की तरह बादलों को, पेड़ों को, हवा को टाटा किया करता। उसके सब साथी उससे ऊबने लगे थे। उसे चिढ़ाने लगे थे। धरमेन्दर को पागल समझने लगे थे। साथी, जितना उसे पागल समझते, उतना ही उसका नरेन्दर बनने का संकल्प मजबूत होता जाता था।

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वह बिना टिकट एक दिन दिल्ली पहुंच गया। लोक कल्याण मार्ग पर उसे बार बार चक्कर लगाता देख पुलिस ने उसे पकड़ लिया। फिलहाल वह जेल में हैं। वहां उससे पूछताछ जारी है। वहां भी वह नरेन्दर -नरेन्दर का अहर्निश जाप किया करता है। उसे उम्मीद है कि एक दिन नरेन्दर खुद आएंगे। जेल से उसे छुड़ाकर ले जाएंगे और अपनी भक्ति का आदर्श बताते हुए उसे युवाओं के सामने पेश करेंगे। उस दिन तालियों की गड़गड़ाहट से दुनिया का आकाश गूंज जाएगा। नरेन्दर को भी एक दिन सब भूल जाएंगे। सब धरमेन्दर -धरमेन्दर करेंगे।

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष हैं।)
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