AAJ24

[state_mirror_header]

संयुक्त पंजीयक की कार्यवाही से सहकारिता तंत्र पर उठे सवाल, एफआईआर में 6 नाम तो फिर कार्यवाही केवल एक पर क्यों,

Bharat Sharma

अंबिकापुर । अंबिकापुर में पदस्थ संयुक्त आयुक्त सहकारिता एवं संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं सुनील तिवारी द्वारा की गई हालिया कार्रवाई ने सहकारिता तंत्र में नई बहस छेड़ दी है। मामला वर्ष 2019-20 की धान खरीदी से जुड़ा है, जिसमें अनियमितताओं के आरोपों पर 2022 में एफआईआर दर्ज हुई थी, उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस एफआईआर में छह नाम शामिल थे, लेकिन विभागीय स्तर पर जो कार्रवाई सामने आई, उसमें मुख्य रूप से एक कर्मचारी समिति स्तर के प्रभारी प्रबंधक को केंद्र में रखा गया। यही वह बिंदु है जहां से विवाद और सवालों की श्रृंखला शुरू होती है।

- Advertisement -

     सहकारिता विभाग की साख केवल कठोर आदेशों से नहीं, बल्कि संतुलित और पारदर्शी कार्रवाई से बनती है। यदि छह नाम एफआईआर में हैं, तो कार्रवाई की रोशनी भी समान रूप से पड़नी चाहिए। अन्यथा चयनात्मक निर्णयों की धारणा प्रशासनिक विश्वसनीयता को कमजोर करती ह। अब निगाहें इस बात पर हैं कि विभाग शेष आरोपियों की स्थिति स्पष्ट करेगा या नहीं। और क्या भविष्य में इस प्रकार के मामलों में एकरूप और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

- Advertisement -

एफआईआर 2022 की, सक्रियता 2026 में…

       प्रश्न यह है कि यदि 05 अप्रैल 2022 को एफआईआर दर्ज हो चुकी थी, तो विभागीय कठोर कार्रवाई में लगभग चार वर्ष का अंतर क्यों? क्या जांच लंबित थी? क्या विभागीय स्तर पर कोई आंतरिक परीक्षण चल रहा था? या फिर मामला फाइलों में दबा रहा और अब अचानक प्राथमिकता में आ गया? समय-सीमा में यह अंतर प्रशासनिक सुस्ती या परिस्थितिजन्य विवशता। दोनों में से किसे दर्शाता है, यह स्पष्ट होना चाहिए।

See also  Ratlam News/राॅयल काॅलेज के बी.सी.ए. एवं बी.कॉम. का विक्रम वि.वि. परीक्षा परिणाम शत प्रतिशत रहा।

छह आरोपी, कार्रवाई एक पर…

       एफआईआर में छह नाम दर्ज बताए जाते हैं,ऐसे में यदि विभागीय पत्राचार और चेतावनी मुख्य रूप से एक व्यक्ति पर केंद्रित है, तो शेष पांच की स्थिति क्या है? क्या वे निर्दोष पाए गए? क्या उनके विरुद्ध अलग प्रक्रिया चल रही है? या फिर जांच की दिशा ही बदल दी गई? प्रशासनिक सिद्धांत कहता है कि जवाबदेही सामूहिक हो तो कार्रवाई भी संतुलित और समान होनी चाहिए। चयनात्मक सख्ती से पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगता है।

पत्र की भाषा और जिम्मेदारी का स्थानांतरण

     विभागीय आदेश में यह भी उल्लेखित है कि यदि आरोपी कर्मचारी को सेवा से पृथक नहीं किया गया और भविष्य में कोई गड़बड़ी होती है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की मानी जाएगी। यह निर्देश असामान्य रूप से कठोर माना जा रहा है। सवाल उठता है—क्या विभाग अपने पूर्व विलंब की भरपाई तत्कालिक कठोरता से कर रहा है?

क्या निर्णय प्रक्रिया प्रभावित है?

      स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि सहकारिता विभाग के न्यायालयीन माहौल में बैंक कर्मचारी और कुछ प्रभावशाली समूहों की उपस्थिति प्रभाव डालती है, आरोप यह भी हैं कि कार्यालय में बैठकर अनौपचारिक चर्चाएं निर्णयों को दिशा देती हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि ऐसा वातावरण बनता है तो यह संस्थागत निष्पक्षता के लिए चिंताजनक संकेत है।

सेवानिवृत्ति समीप—क्या प्राथमिकताएं बदलीं?

      संयुक्त आयुक्त के कार्यकाल के अंतिम चरण में होने की बात भी चर्चा में है, कुछ लोग इसे तेज निर्णयों की वजह मानते हैं, तो कुछ इसे चयनात्मक सक्रियता से जोड़कर देखते हैं। परंतु यह केवल अटकलें हैं, किसी भी अधिकारी के निर्णय को तथ्य और दस्तावेज़ के आधार पर ही परखा जाना चाहिए।

See also  भव्य निष्ठा कावड़ यात्रा-2025: माही जल से होगा बाबा महाकालेश्वर का जलाभिषेक, 400 से अधिक कावड़ यात्री लेंगे हिस्सा ;18 जुलाई को रतलाम से उज्जैन रवाना होगी यात्रा

फेडरेशन और आंतरिक राजनीति का कोण

    सहकारिता तंत्र में कर्मचारी- अधिकारी समूहों के बीच शक्ति संतुलन भी इस मामले से जुड़ा माना जा रहा है। यदि किसी कार्रवाई के बाद कुछ वर्ग विशेष में उत्साह दिखता है, तो यह संकेत देता है कि आंतरिक समीकरण पहले से मौजूद थे। क्या यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया थी, या फिर संगठनात्मक दबावों का परिणाम—यह स्पष्ट होना शेष है।

संयुक्त आयुक्त के फैसले पर उठे सवालः समान कार्रवाई या चयनात्मक प्रहार?

धान खरीदी प्रकरणः चार साल की खामोशी के बाद एक पर गाज क्यों?

सहकारिता विभाग में ‘टारगेटेड एक्शन’ की चर्चा तेज

एफआईआर 2022 की, कार्रवाई 2026 में—और दायरा सीमित क्यों?

सहकारिता तंत्र में पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्हः बाकी पांच कहां है?

पारदर्शिता और समानता पर पूरा प्रकरण तीन मूल सवालों पर आ टिकता है…

क्या विभागीय कार्रवाई समयबद्ध और निष्पक्ष थी?

क्या सभी आरोपियों के विरुद्ध समान प्रक्रिया अपनाई गई?

क्या निर्णय प्रक्रिया बाहरी प्रभावों से मुक्त है?

     जब तक इन प्रश्नों के आधिकारिक और तथ्यात्मक उत्तर सार्वजनिक नहीं होते। तब तक यह मामला सहकारिता तंत्र में अविश्वास और असंतोष का विषय बना रहेगा।

छः नामों की एफआईआर, कार्रवाई एक पर…

सहकारिता विभाग में चयनात्मक सख्ती?

चार साल बाद जागा विभागः आखिर निशाने पर सिर्फ एक ही क्यों?

सहकारिता न्यायालय में सवालों की गूंज : छह आरोपी,पर जिम्मेदार एक?

एफआईआर में छह, विभागीय वार में एक—क्या है अंदर की कहानी?

देरी से कार्रवाई,एक पर सख्ती…क्या सहकारिता तंत्र में संतुलन बिगड़ा?

Share This Article