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मैनपाट में पेंशन के महज कुछ रुपए के लिए 90 वर्षीय सास को पीठ पर लादकर 5 किलोमीटर का सफर पैदल चलकर बैंक पहुंची बहु ने खोली सुशासन की पोल,

Priyanshu Ranjan

अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट से आई एक रूह कंपा देने वाली और बेहद शर्मनाक तस्वीर ने विष्णुदेव साय सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह नंगा कर दिया है। सरकारें महलों में बैठकर ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘घर-पहुंच सेवा’ के बड़े-बड़े विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये फूंक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी एक गरीब बहू को अपनी 90 साल की लाचार, जर्जर और बुजुर्ग सास की चंद रुपयों की पेंशन के लिए उन्हें अपनी पीठ पर लादकर मीलों पैदल चलने को मजबूर होना पड़ रहा है।

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मैनपाट ब्लॉक के ग्राम कुनिया जंगलपारा का यह पूरा मामला केवल एक बेबस परिवार की मजबूरी नहीं है, बल्कि यह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के दावों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यहाँ रहने वाली बहू सुखमनिया बाई पिछले कई महीनों से अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को इसी तरह पीठ पर ढोने पर मजबूर है, ताकि इस उम्र में उनके जिंदा रहने का सहारा न छिन जाए।

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इस भीषण गर्मी और तपती धूप में जब सरकार के वातानुकूलित कमरों में बैठे बड़े-बड़े आईएएस अधिकारी और नेता फाइलों पर डिजिटल इंडिया का जश्न मना रहे होते हैं, तब यह बेबस बहू अपनी 90 साल की सांस को पीठ पर बैठाकर, पथरीले और दुर्गम रास्तों, नालों को पार करते हुए 5 किलोमीटर दूर ‘नर्मदापुर सेंट्रल बैंक’ पहुंचती है। बहू की आंखों से बहते आंसू और बुजुर्ग महिला के चेहरे पर छाई बेबसी की यह मार्मिक तस्वीर किसी भी इंसान का कलेजा चीरने के लिए काफी है, लेकिन साय सरकार के बेलगाम और संवेदनहीन अधिकारियों की आंखों का पानी मर चुका है।

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पहले बुजुर्गों को उनके घर पर ही सम्मान के साथ पेंशन मिल जाया करती थी, लेकिन कुछ महीनों से बैंक ने इस लाचार परिवार के लिए नरक के द्वार खोल दिए। बैंक प्रबंधन और प्रशासन का कहना है कि पेंशन चाहिए तो 90 साल की इस वृद्धा को खुद आकर फिंगरप्रिंट या भौतिक सत्यापन कराना होगा। क्या कंप्यूटर की एक स्क्रीन और अंगूठे का निशान, एक इंसानी जिंदगी की तकलीफ से बड़ा हो गया है?

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